धर्मिक कट्टरता देश के विकास में बाधक
‘‘किसी भी देश को विकास पथ पर निरंतर आगे बढ़ने के लिए
धार्मिक कट्टरवाद से मुक्त होना अत्यन्त आवश्यक हो गया है। धार्मिक सहिष्णुता और
इंसानियत धर्म के पालन से ही विकास संभव है।’’
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वैश्वीकृत विकास का
वर्तमान स्वरूप
आज जब बाबा बागड़ी अपना संदेश
प्रारम्भ करने जा रहे थे तो फारूख से पूछ बैठे ‘क्या धर्म के सहारे से किसी देश का विकास सम्भव है?’
फारूख: धर्म को राजनीति से मिलाना किसी देश के हित में नहीं हो सकता। धर्म के
उपदेशक सिर्फ आध्यात्म का पाठ पढ़ाने में सक्षम हो सकते हैं। देश के शासन की बागडोर
नहीं सम्भाल सकते।
बाबा बागड़ी: बल्कुल ठीक कहा तुमने। आज इसी विषय पर गहराई से प्रकाश
डालेंगे। उसके लिए वैश्वीकृत विकास के वर्तमान स्वरूप को समझना होगा। यातायात एवं संचार साधनों के विकास के साथ ही गांव
से शहर और शहर से मैट्रो शहर और इसी प्रकार पूरे विश्व के देश आपस में इस प्रकार
जुड़ चुके हैं कि पूरा संसार एक संयुक्त गांव की भांति हो गया है। पूरे विश्व का
विकास एक साथ हो रहा है और सब देश अन्य देशों पर निर्भर हो गये हैं। सभी देशों को
अन्य देशों से व्यापारिक सम्बन्ध बनाये रखना आवश्यक हो गया है। बिना व्यापारिक
सम्बन्धों के देश की जनता अपना सामान्य जीवन जीने से भी वंचित हो जाती है। उन्नति
तो दूर की बात रह जाती है। भौतिकवादी वर्तमान युग में किसी एक देश के लिए सम्भव नहीं है कि वह अपने
संसाधनों, वन संपदा, खनिज संपदा और कारखानों में उत्पादित वस्तुओं से अपनी जनता की सभी
आवश्यकताओं की पूर्ति कर सके। कोई भी उत्पादक देश अपने उत्पादन को सिर्फ देश तक
सीमित कर उत्पादन लाभ नहीं ले सकता। अतः जहाँ विकसित देश अपने उत्पादन बेचने के
लिए अविकसित एवं विकासशील देशों में बाजार ढूंढने को मजबूर हैं तो गरीब एवं
विकासशील देश की जनता को विभिन्न उत्पादक वस्तुओं के लिए विकसित देशों का सहारा
लेना पड़ता है। विकसित देशों के पास पूंजी है परन्तु श्रम शक्ति की कमी है तो
विकासशील देशों के पास पूंजी का अभाव है, बेरोजगारी
है, अथाह श्रम शक्ति है। अतः सभी देशों को किसी
न किसी रूप में एक-दूसरे पर निर्भर रहना होता है।
उपरोक्त निर्भरता को इस प्रकार समझा जा सकता है। एक बाग में
बहुत बड़ी मात्रा में सेब लगे हैं यदि वह स्थानीय बाजार में बेचे जायें तो स्थानीय
खपत के पश्चात बहुत बड़ी मात्रा में सेब बच जाता है यदि उसे अन्य किसी शहर और फिर
किसी अन्य देश को न भेजा जाये तो बाकी बचा सेब सड़ जोगा और सेब उत्पादक को अपने
उत्पाद का पूरा लाभ न मिलकर कम लाभ से सब्र करना पड़ेगा और शायद अगली फसल के
उत्पादन की तैयारी भी कम करें। परन्तु यदि उसके सेबों को खरीदने के लिए अन्य शहरों
एवं अन्य देशों से व्यापारी आते हैं, उसे बचे सेब की
खेप के उचित दाम मिल जाते हैं और व्यापारी जिस देश से आते हैं उस देश की जनता को
सेब का रसास्वादन करने को प्राप्त हो जाता है। विश्व की जनता प्रत्येक देश के
उत्पादन का उपभोग कर सकती है। यद्यपि वह वस्तु उसके देश में उत्पादित नहीं होती।
इस प्रकार विश्व का प्रत्येक देश अन्य देशों से सम्बद्ध हो चुका है। अन्य देशों पर
निर्भरता बढ़ गई है।इसी प्रकार यदि किसी देश के अन्य
देशों से सम्बंध मधुर नहीं हैं तो उस देश से नवविकसित तकनीक एवं टैक्नीशियन
प्राप्त नहीं कर सकता और कारखानों में उत्पादन पुरानी तकनीक से करते रहने को मजबूर
होगा। यदि आपस में सबसे मधुर सम्बंध बने हुए हैं किसी देश से आवश्यकतानुसार श्रम
शक्ति (इंजीनियर एवं विशेषज्ञ) आयात कर अपने देश की आवश्यकताएं पूर्ति कर सकता है।किसी देश के विकास के लिए पूरे विश्व
से सहयोग सहभागिता, व्यापार सम्बंध आवश्यक हैं। धार्मिक
कट्टरता विभिन्न देशों से सम्बंधों में मधुरता नहीं ला सकती।
जय भगवान: आपके कहने का तात्पर्य यह है प्रत्येक देश और समाज की मजबूरी है कि विश्व
पटल से कदम से कदम मिलाकर चलने के लिए धार्मिक कट्टरता को त्यागना होगा।
फारूख: प्रत्येक देश को धार्मिक भावना से उठकर इंसानियत की भावना पर आधारित होना
होगा।
बाबा बागड़ी: तुम लोगों ने मेरी बात को ठीक प्रकार से समझा। समय की
आवश्यकता है हम अपनी सोच को विकसित कर अपने कुएं से बाहर निकलें ताकि हमारा जीवन
स्तर और देश का विकास उच्चतम स्तर को प्राप्त कर सके। आगे मैं बताने जा रहा हूं
विश्व सहयोग क्यों आवश्यक है।
विकास के लिए विश्व
सहयोग आवश्यक
आज के भौतिक युग में सभी देशों की
तालमेल की आवश्यकता पर प्रकाश डाल रहे हैं बागड़ी बाबा।
बागड़ी बाबा: आज हमारा भौतिक विकास इस स्तर तक पहुंच गया है कि इससे ऊपर
विकास करने के लिए विश्व समुदाय को एक साथ मिलकर चलना होगा। कोई भी देश प्रत्येक
वस्तु का उत्पादन नहीं कर सकता। सभी देशों की वन सम्पदा, खनिज सम्पदा, बौद्धिक सम्पदा भिन्न जलवायु के कारण
अलग-अलग है। विकास के लिए सभी प्रकार के खनिजों, वनस्पतियों एवं बौद्धिक क्षमताओं की आवश्यकता होती है। इसके अतिरिक्त कल
कारखानों के उत्पादन के आदान-प्रदान के लिए प्रत्येक देश को एक-दूसरे की आवश्यकता होती है जो आज के विकास का मुख्य स्रोत
बने हुए हैं। कल कारखाने के विकास से ही हमारे जीवन में सुविधाएं उपलब्ध हो पाती
हैं और हमारा जीवन स्तर ऊँचा होता है। एक कार निर्माता को कारखाना लगाने के लिए
पहले भारी पूंजी जुटानी होती है वह अपने देश और विदेश से धन एकत्र करता है फिर
उसकी उत्पादित कारों के लिए विश्व का बाजार चाहिये वरना उसका उत्पादन सीमित रह
जायेगा और सीमित उत्पादन से कारखाने की लागत के खर्चे, उत्पादन में नियोजित श्रम एवं मशीनरी की मेंटीनेंस के खर्चे पूरे न हो पाने के कारण कारखाने को
चलाते रहना असम्भव हो जायेगा। इसी प्रकार सभी कारखाने विश्व समुदाय के सहयोग से ही
चल पाते हैं और वस्तुओं की कीमत हर इंसान की पकड़ में आ पाती है।
इतिहास उठाकर देखने से ज्ञात होता है पुराने समय में प्रायः
अपने देश के अस्तित्व को बचाये रखने के लिए अपनी काफी ऊर्जा व्यय करनी पड़ती थी।
यद्यपि रक्षा व्यय अब भी काफी होते हैं परन्तु किसी देश का अस्तित्व खतरे में नहीं
रहता क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय समुदाय किसी भी देश को अन्य देश पर कब्जा करने नहीं
दे सकता है। अतः विश्व समुदाय से अलग हो देश का अस्तित्व भी खतरे में पड़ सकता है।
जय भगवान: अर्थात् हमारी उन्नति विश्व समुदाय पर
निर्भर हो गयी है।
बाबा बागड़ी: यदि मानव सामाजिक प्राणी नहीं होता तो जिस
विकास की मंजिल पर आज पहुंचा है, पहुंचना सम्भव था। तुम अकेले अथवा कुछ परिवार मिलाकर क्या कर
सकते हो? अपने लिए
कपड़े बना सकते हो उसको सिलने के लिए मशीन और बटन तैयार कर सकते हो, मशीन के लिए लोहे के
कारखाने और खान से लोहा निकाल सकते हो।
क्या तुम खेतीबाड़ी
में सभी आवश्यक खाद्य पदार्थ अपने लिए पैदा कर सकते हो। जैसे गेहूं, विभिन्न मसाले, सब्जियां बहु प्रकार
के फल पैदा कर पाओगे? क्या कागज
और पैन प्राप्त करने के लिए जूता तैयार करने के लिए, सोना चांदी उत्पादन, विभिन्न दवाईयां
प्राप्त करने के लिए स्वयं कारखाने लगाने के लिए सक्षम हो सकते हो? टी.वी. फ्रिज, मोबाइल, स्कूटर, कार, मकान के लिए सीमेंट, ईंट, क्या-क्या तुम स्वयं
तैयार कर सकते हो? यही कारण है
अब एक शहर या गांव तक सीमित नहीं रह गया है, पूरे देश के लिए भी असम्भव हो गया है कि वह स्वयं सबकुछ
तैयार कर जनता को विश्व स्तरीय जीवन स्तर दिला सके।
इसी वजह से भारतीय
नेताओं ने, विशेषज्ञों
ने विश्व उद्यमियों के लिए भारत में उदारता के द्वार खोले और आर्थिक उन्नति के लिए
स्वयं को विश्व समुदाय के साथ जोड़ा जिसने सवतंत्र प्रतिस्पर्द्धा को जन्म दिया।
जनता को रोजगार के अवसर प्राप्त हुए और विश्व स्तरीय वस्तुओं का उपयोग करने का
मौका मिला, साथ ही देश
के कारखानों, बागानों, खेत खलिहानों के लिए
विश्व का बाजार मिला ताकि उन्हें उचित कीमत मिल सके और अधिक उत्पादन के अवसर मिल
सकें।
उपरोक्त उदाहरणों से वस्तु स्थिति स्पष्ट हो गयी होगी कि
क्यों विश्व सहयोग चाहिये?
फारूख: आज तो बाबाजी आपने मेरे दिमाग के द्वार खोल
दिये। व्यक्तिगत रूप से तो मैं स्वयं, मेरा परिवार, मेरा समाज, मेरा देश स्वयं अपनी आवश्यकता पूर्ण नहीं कर सकते। सबकुछ तालमेल
से ही सम्भव है। धार्मिक कट्टरता हमें उन्नति नहीं दिला सकती।
बाबा बागड़ी: अब हम यहीं पर विश्राम लेते हैं।
आज बाबा बताने वाले हैं किस प्रकार
धार्मिक उदारता किसी भी देश को विकसित देश बना सकने में सक्षम है।
बाबा बागड़ी: कोई भी समाज अथवा देश विकास के पथ पर आगे बढ़ना चाहता है तो
धार्मिक उदारता को गले लगाना होगा। सभी धर्मों का सम्मान ही विश्व के अन्य धर्म प्रेमियों को जोड़ सकता है। किसी से
व्यापार सम्बन्ध बनाने के लिए जातिवाद, कट्टरवाद
काम नहीं आ सकता। स्वतन्त्र प्रतिस्पर्द्धा के लिए सभी धर्मों को आमन्त्रित करना
होगा। उनकी धार्मिक भावनाओं का ध्यान रखना होगा। उन्हें अपने देश में खुलेपन,
दूरदर्शिता का वातावरण प्रदान करना होगा। कोई भी देश
अपनी शर्तों पर दूसरे देश से स्वछन्द व्यवहार नहीं कर सकता।
आज विश्व में विकसित देशों के अनेक
उदाहरण मौजूद हैं, जो ‘सर्वधर्म सम्भाव’ का उदाहरण बनकर
विकसित हुए हैं। अमेरिका, ब्रिटेन अन्य
यूरोपीय देश सभी निष्पक्ष न्याय एवं व्यवहार में विश्वास करते हैं। स्वयं ईसाई होते हुए भी सभी अन्य
धर्मानुयायी वहाँ निवास करते हैं जिन्होंने वहाँ के विकास में महत्वपूर्ण योगदान
दिया है। अमेरिका में अनेक उच्च श्रेणी के वैज्ञानिक, डॉक्टर, इंजीनियर, राजनीतिज्ञ भारतीय मूल के हिन्दू या मुसलमान हैं। खाड़ी के देशों का उदाहरण
सबके सामने हैं, जिस देश ने धार्मिक उदारता दिखाई
विकसित श्रेणी के देशों में खड़ा हो गया जैसे कुवैत, यूएसई, ओमान, बहरीन, कतर इत्यादि सभी मुस्लिम देश हैं
परन्तु अपनी उदारता के कारण सर्वसाधन सम्पन्न हो गये। जबकि ईरान, ईराक, अफगानिस्तान,
पाकिस्तान, सउदी अरब अपनी
कट्टरता को न छोड़ पाने के कारण आज भी विकसित नहीं हैं। जबकि ईरान, इराक, सउदी अरब के पास
अकूत तेल सम्पदा है। अफगानिस्तान के पास प्राकृतिक सम्पदा की कोई कमी नहीं है
परन्तु कट्टरता के कारण अशांत क्षेत्र है और अविकसित है। अतः धार्मिक उदारता ही
विकास की सीढ़ी पर चढ़ने का मौका दे सकती है। क्योंकि विश्व में अब राजतन्त्र के दिन
लद चुके हैं। धीरे-धीरे सभी देश लोकतंत्र की ओर बढ़ रहे हैं। लोकतन्त्र अर्थात जनता
के वोट पर आधारित सरकारी तंत्र। अतः यह आवश्यक हो जाता है कि जनता के प्रत्येक
वर्ग, प्रत्येक धर्म का सम्मान किया जाये।
प्रत्येक देश के लिए धर्मनिरपेक्ष होना आवश्यक होता जा रहा है। देश के कोने-कोने
में शांति और विकास की लहर लाने के लिए धार्मिक उदारता मुख्य मार्ग है।
धर्म के स्थान पर
इंसानियत का महत्व
बाबा बागड़ी इस विषय के माध्यम से
अपने मूल सिद्धान्त ‘इंसानियत का धर्म’ का परिचय कराने का प्रयास कर रहे हैं।
बाबा बागड़ी: विश्व पटल पर धार्मिक महत्व के घटने के
कारण आपसी तालमेल आपसी
व्यवहार के लिए सभी धर्मों के मूल सिद्धान्त ‘इंसानियत’ पर अमल करना आवश्यक हो गया
है। अभी तक धर्म ही देश में व्यवस्था को संभालने
का मुख्य कारक होता था जो अनेकों संघर्षों का भी जन्म देता रहता था परन्तु आम जनता
अपने-अपने धर्मों द्वारा संचालित होती थी परन्तु समय परिवर्तन और भौतिकवाद ने अब धर्म व्यवस्था को गौड़ कर दिया है।
54-बागड़ी बाबा और
इंसानियत का धर्म
अब या तो राष्ट्रीय सरकारों द्वारा
बनाये गये कानून जनता को व्यवस्थित करते हैं, देश विदेशी व्यवहार में अंतर्राष्ट्रीय नियम कानून के अनुसार चलना होता है
और सबसे ऊपर इंसानियत का धर्म निभाते हुए अपने व्यवहार नियंत्रित करने होते हैं,
जो व्यक्ति, संस्था और
देश को विश्व पटल पर अपनी साख बनाने में सहायक होते हैं और पूरे विश्व का सहयोग
पाने में कामयाब होते हैं।
फारूख: बाबा यह इंसानियत का धर्म क्या होता है? इसके क्या नियम हैं और कैसे निभाया जाता है और क्यों?
बाबा बागड़ी: फारूख मियां इस धर्म के बारे में भी आने वाले समय में हम
तुम्हें विस्तार से बतायेंगे।
जय भगवान: बाबा यदि कोई व्यक्ति किसी धर्म को न मानकर सिर्फ इंसानियत को मान ले तो
क्या गलत होगा?
बाबा बागड़ी: कोई गलत नहीं होगा, वरन उनसे
अच्छा ही होगा जो धर्म को मानते हुए मन्दिर मंे घंटे बजाते हैं और मन्दिर से बाहर
आकर किसी का गला काटकर अपना पेट भरने की सोचते हैं। अर्थात अपने व्यवहार में धर्म
के मूल उद्देश्य ‘इंसानियत’ को भूल जाते हैं। कोई भी इष्ट देव किसी दुष्कर्म की आज्ञा नहीं देता। धर्म
का अर्थ ही है अच्छाई का धारण करना, इसका धारण न करने
वाला कभी भी धार्मिक कहलाने का अधिकारी नहीं है। इसके साथ ही आज का समय यहीं
समाप्त होता है और अध्याय पांच भी।
*********
‘‘विज्ञान के विकास शिखर पर पहुंचने के बावजूद
आज भी अनेकों रहस्य अनसुलझे रह गये हैं और उन रहस्यों से पर्दा उठने की सम्भावना
भी नहीं लगती। जो आज भी मानव को अदृश्य शक्ति पर विश्वास करने को मजबूर कर रही
हैं।’
जीवों की उत्पत्ति
एवं उनका विकास
बाबा ने इस अध्याय के माध्यम से अपने
शिष्यों को बताया-क्यों इंसान आज भी (अर्थात आज के वैज्ञानिक युग में) जबकि विज्ञान ने
प्रकृति के हर क्षेत्र में हस्तक्षेप कर अनेक अविष्कार किये हैं, अनेकों प्राकृतिक
नियम प्रतिपादित किये हैं,
फिर
भी किसी अदृश्य शक्ति पर विश्वास करने को मजबूर होता है। अनेकों प्रश्नों के उत्तर
आज भी मानव को नहीं मिल पाये हैं जिनका विज्ञान के पास कोई हल नहीं है।
बाबा बागड़ी:अनेकों जीव
एवं वनस्पतियों की उत्पत्ति एवं विकास, आज भी यक्ष प्रश्न बना हुआ है। कैसे एक बीज मिट्टी, पानी, वायु एवं
सूर्यकिरणों के सहयोग से पहले पौधे और बाद में पेड़ के रूप में विकसित हो जाता है।
कैसे विकास प्रक्रिया के तहत पहले पौधे में कली फिर फूल और तत्पश्चात फल आता है।
क्यों एक आम का बीज आम के पेड़ के रूप में विकसित होता है, सन्तरा या अन्य कोई
नहीं? क्यों तोरई, खीरा, करेला का पौधा बेल
के रूप में पनपता है, पेड़ के रूप
में नहीं उगते। जबकि आम का पौधा बेल का रूप न लेकर पेड़ बनता है। क्यों तरबूज, खरबूजे भी आम या
पपीते की भांति पेड़ पर नहीं लगते। इसीप्रकार विभिन्न जीवों की है जो नर एवं मादा
के सहयोग से वही जाति का जीव पैदा होता है वही नस्ल वही जातीय गुण उसमें विकसित
होते हैं। जन्म के समय बहुत छोटे शिशु होते हैं और फिर अपने माता-पिता के बराबर
विकसित होकर पूर्ण जीव का रूप ले लेते हैं और विकास रूक जाता है फिर अगली पीढ़ी
तैयार करने लगते हैं। एक ही जलवायु में पैदा होने वाले पौधे अपने बीज प्रजाति के
गुण के अनुसार जमीन से भिन्न विटामिन, मिनरल ग्रहण कर फल फूल तैयार होते हैं। जैसे अंगूर में
आयरन, केले में
कैल्शियम, गाजर में
कौपर और आयरन, सेब में
पौटेशियम सेलीनियम आदि होते हैं। विभिन्न फलों में विभिन्न पौष्टिकता के गुण होते
हैं जबकि जमीन की मिट्टी वही है। प्रत्येक पौधे के पेड़ के डीलडौल के अतिरिक्त
पत्तियाँ भी प्रत्येक जाति के पौधे की अलग-अलग रूप लिये होती हैं। अभी तीन लाख से
अधिक पौधों की जातियां पाई गयी हैं। जो बिल्कुल भिन्न भिन्न गुण लिए हुए हैं।
वनस्पतियों के अतिरिक्त जीवों की
प्रजातियाँ भी लाखों में हैं जो अदृश्य बैक्टीरिया से लेकर विशालकाय व्हेल मछली तक
विश्व पटल पर विद्यमान हैं। सभी जीव एक-दूसरे के भोजन के रूप में उपलब्ध हैं। यह भी
अनउत्तरित प्रश्न है, क्यों
वनस्पति एवं विभिन्न
जीव (मानव समेत) उत्पन्न होते हैं और क्यों फिर मर जाते हैं। मानव विकसित विज्ञान
इन प्रश्नों के उत्तर आज भी नहीं ढूंढ पाया है।
फारूख:वास्तव में
यह आश्चर्यजनक विषय है कि पौधे स्वतः उपयुक्त जलवायु में पेड़ का रूप ले लेते हैं
और फिर बरसों तक बिना किसी खाद पानी के बने रहते हैं और फल उत्पन्न करते रहते हैं।
प्रत्येक जीव के आंख, नाक, कान स्वतः बनते हैं
और उचित स्थान पर ही बने होते हैं। किसी मानव शिशु के आँखें पीछे नहीं पायी गयीं
और नाक, पैर अथवा
टांग में लगी हुई नहीं पैदा हुई। सभी परिन्दों के पंख-चोंच, टांगे अपने
माता-पिता के समान ही बनते हैं।
जय भगवान: सृष्टि
का होना भी अपने आप में विकट प्रश्न है। इस सृष्टि का आशय क्या है। मानव सुख दुःख क्यों भोगता है और फिर
समाप्त हो जाता है।
बाबा बागड़ी:ये सब आश्चर्यजनक प्रश्न ही
मानव को अदृश्य शक्ति पर विश्वास करने के लिए मजबूर करते हैं ताकि अज्ञात कारणों
का जिम्मेदार उसे बनाया जा सके और मानव अपने सुख और दुखों का कारण उसे समझ कर
अशान्ति से बच जाता है। अपने जीवन को आसान बना लेता है परन्तु सब कुछ विश्वास के
ऊपर निर्भर है।
सौर मण्डल एवं आकाश
गंगा का अस्तित्व
आज बाबा बागड़ी सौर मण्डल के अस्तित्व
पर प्रश्न चिन्ह लगाकर, मानवचित्त
की मजबूरी बयां कर रहे हैं।
बाबा बागड़ी: सभी जीवों
में सिर्फ मानव ही ऐसा जीव है जो सोचने समझने की क्षमता रखता है। अतः
उसका जिज्ञासू मन प्रत्येक कारण का उत्तर चाहता है जब उसे अपने विज्ञान से अपने
अनुभव से, अपने पूर्व
इतिहास से अपनी उत्सुकताओं के उत्तर नहीं मिलते तो एक दृश्य शक्ति पर विश्वास कर
अपनी जिज्ञासा शांत कर लेता है। अर्थात यह कहा जा सकता है कि अपनी उत्सुकताओं का
तर्क संगत उत्तर न मिल पाने के कारण उसकी मजबूरी बन जाती है कि वह किसी अदृश्य
शक्ति की कल्पना पर विश्वास कर ले। यद्यपि सभी लोग इन कल्पनाओं पर विश्वास नहीं कर
पाते हैं।
सौर मण्डल-आकाश गंगा का अस्तित्व ही
एक अनसुलझा प्रश्न उत्पन्न करता है। सौर मण्डल अर्थात सूर्य, पृथ्वी, शुक्र, ब्रहस्पति, शनि आदि उसके समस्त
ग्रह कैसे अस्तित्व में आये और क्येां? पृथ्वी पर ही सृष्टि सुलभ वातावरण क्यों उत्पन्न हुआ और
क्यों, पृथ्वी पर
सृष्टि का सृजन हुआ? इन सब
प्रश्नों का उत्तर, धर्म द्वारा
ईश्वर की कल्पना कर दिया जाता है। परन्तु ईश्वर का अस्तित्व कैसे हुआ उसका क्या
उद्देश्य है। सौर मण्डल बनाने का क्या उद्देश्य है? हमारे सौर मण्डल जैसे आकाश गंगा में स्थित
अनेकों सौर मण्डलों का क्या मकसद है? पृथ्वी पर अनेक जीव जन्तु-पेड़-पौधे और मानव जाति की
उत्पत्ति का, क्या मतलब
हो सकता है मानव जैसे बुद्धिमान जाति के अस्तित्व का? विज्ञान द्वारा अभी
तक कोई तर्कसंगत उत्तर उपरोक्त प्रश्नों का नहीं ढूंढा जा सका है। अतः तर्कसंगत
उत्तरों के अभाव में सिर्फ विश्वास के भरोसे धर्म निभाना मजबूरी बन जाती है और
इंसान अपने इष्ट देव के देवालय (मन्दिर, मस्जिद, चर्च,
पगोडा
आदि) बनाकर उसकी पूजा अर्चना कर अपने मन को शांत करने का उपाय कर लेता है। यह
विश्वास उसे अनेक जीवन के दुखों में धैर्य बनाये रखने में सहायक होता है। यदि मन
शांत होता है, तो अनेक
दुर्लभ कार्यों में भी सफलता की सम्भावना बढ़ जाती है। सफलता मिलते ही उसका ईश्वर
पर विश्वास भी दृढ़ होता जाता है।
जय भगवान: बाबा हमारे
समाज में तो सूर्य देवता और चन्द्रदेवता माने जाते हैं और पूजा की जाती है फिर
उनके अस्तित्व पर प्रश्न उठाना कहाँ तक उचित है, जो कि साक्षात दिखाई देते हैं।
बाबा बागड़ी: हिन्दू
धर्म की विशेषता रही है कि जिस वस्तु से मानव समाज का अस्तित्व जुड़ा हुआ है, उसे ईश्वर के रूप
में पूजा जाता है। सूर्य के बिना पृथ्वी पर सृष्टि की कल्पना बेमानी है, क्योंकि पृथ्वी के
लिए ऊर्जा का मुख्य स्रोत सूर्य ही है। अतः उसे ईश्वर के रूप में मान्यता दी गई।
इसी प्रकार चन्द्रमा रात्रि में शीतलता प्रदान करता है, अंधेरे में दिखाता
है उसे भी देवता के रूप में पूजा गया। जबकि वैज्ञानिकों ने वहाँ पर कदम रखकर सिद्ध
कर दिया है कि चन्द्रमा भी पृथ्वी की भांति धरातल है और बड़ी-बड़ी खाईयों का समूह है, सूर्य की ऊर्जा से
चमकीला दिखाई देता है। पानी और हवा के अभाव में वहाँ सृष्टि की उत्पत्ति हुई है।
अनेक रहस्यात्मक
तथ्य
अब बाबा बागड़ी कुछ ऐसे प्रश्न रख रहे
हैं जिनके उत्तर के अभाव में इंसान किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाता है, देखें क्या हैं वे
रहस्य भरे प्रश्न?
बाबा बागड़ी: बहुत सारे प्रश्न
ऐसे हैं जिनको सोचकर भी इंसान की बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है जिनका उत्तर इंसान की
बुद्धिमत्ता के परे है। जैसे प्रारम्भ में इंसान एवं विभिान्न अन्य जीवों का
अस्तित्व कैसे हुआ। प्रथम इंसान, प्रथम जीव वह भी विभिन्न प्रजातियों में (लाखों में), प्रथम वनस्पति पौधा
अथवा बीज वह भी लाखों प्रकार के कैसे उत्पन्न हुए परन्तु उस प्रारम्भिक रूप में अब
नई आबादी क्यों नहीं होती। अब कोई नई प्रजाति अस्तित्व में क्यों नहीं आती। पृथ्वी
पर विभिन्न गैसें ऑक्सीजन,
नाइट्रोजन, हाइड्रोजन आदि कैसे
आयी, पानी एवं
अन्य द्रव पदार्थ कैसे आये। लोहा, सोना,
चांदी, कॉपर, जैसी अनेक धातुएं
खानों में कहाँ से आ गई। इसी प्रकार अनेकों कैमिकल्स, ऑर्गेनिक्स का आगमन
कैसे हुआ। प्रत्येक गृह में आकर्षण शक्ति का उद्भव कैसे हुआ जिसने अपने से छोटे
अस्तित्व वाले गृह को परिकृमा करने को मजबूर किया।
विज्ञान के नियम के अनुसार यदि गृह
परिकृमा न करें तो अपने से बड़े गृह से टकराकर नष्ट हो जायेंगे। उपरोक्त ऐसे प्रश्न
मानव मन को उद्वेलित कर देते हैं। विज्ञान के सहारे आगे भी इन सब प्रश्नों के
उत्तर मिलने की सम्भावना नहीं है। अन्त में निरूत्तर होकर पूर्वजों द्वारा बताये
आध्यात्मिक रास्ते पर चलने को मजबूर हो जाता है। वह भयभीत हो जाता है कि यदि
वास्तव में ईश्वर अल्लाह, गौड हुआ
अर्थात कोई दिव्य शक्ति हुई
तो मेरे पूजा पाठ न करने पर दण्ड मिल सकता है। अतः धर्माचरण के रास्ते पर चलना ही
उसकी मजबूरी बन जाती है। उसके मन में उठे कौतूहल के तूफान शांत करने का माध्यम
आध्यात्म ही रह जाता है।
जय भगवान:वास्तव में
ये सब ऐसे रहस्य हैं जो आज भी पहेली बने हुए हैं और निकट भविष्य में उत्तर मिलने
की संभावना भी नहीं है।
फारूख:जैसा कि
वैज्ञानिक दावा करते हैं किसी गृह पर भी जीवों का अस्तित्व होने की पूरी सम्भावना
है तो यह रहस्य और भी विस्मयकारी हो जायेगा।
बाबा बागड़ी:यही कारण है
आधुनिक युग में भी जब मानव ने इतना विकास कर लिया है, ईश्वर की कल्पना की
सत्यता पर विश्वास दृढ़ हो जाता है।
विचित्र घटनाओं से
हैरान मन मस्तिष्क
बाबा:अनेकों
प्राकृतिक घटनाएं अथवा आपदाएं जैसे भूकम्प का अनुभव, ज्वालामुखी का फटना, बिजली चमकना, अतिवृष्टि, अल्पवृष्टि, तूफान, समुद्री तूफान, ज्वार भाटा, ओलावृष्टि आदि ऐसी
अप्रत्याशित घटनाएं जिनका उत्तर वैज्ञानिक खोजों से जान लिया गया है परन्तु आज भी
सभी लोग शिक्षित नहीं है अथवा शिक्षित हैं तो विज्ञान के बारे में अनभिज्ञ हैं।उनके लिए उपरोक्त
प्राकृतिक घटनाएं आज भी विधि की विडम्बना ही हैं, जो उनकी धार्मिक आस्था को दृढ़ बनाते हैं और
ईश्वरीय सत्ता को स्वीकार करते हैं। कुछ ऐसे भी व्यक्ति हैं जो विज्ञान के अच्छे
जानकार हैं परन्तु धार्मिक आस्था को वैज्ञानिक तर्कों की कसौटी से तोलने को तैयार
नहीं होते और परम्परागत तरीके से धार्मिक आचरण निभाते हैं और ईश्वरीय अस्तित्व को
स्वीकार करते हैं।इक्कीसवीं सदी के विकसित प्रौद्योगिकी
एवं विज्ञान के बावजूद धार्मिक वातावरण में कोई विशेष परिवर्तन परिलक्षित नहीं
होता। सभी धार्मिक गतिविधियां कुछ संशोधित होकर आज भी विद्यमान हैं।
जय भगवान:बाबा आगे
आने वाला समय कैसा लगता है अर्थात धार्मिक आचरण की क्या सीमाएं हो सकती हैं?
बाबा बागड़ी:वैज्ञानिक
उन्नति के साथ-साथ लोगों की सोच में परिवर्तन तो आना अवश्य है और यह परिवर्तन
धीरे-धीरे आ रहा है। विकास के लिए कट्टरता छोड़ना भी आवश्यक हो गया है। शायद
कट्टरपन का जो उन्माद इस समय विश्व पर छा गया है, बुझते दिये की लौ के कारण हो।
फारूख:यह तो
निश्चित है आने वाले समय में भौतिक विकास को छोड़कर धर्म का साथ देने वाले बहुत कम
होंगे। विकास के साथ-साथ धर्म का पालन तो सम्भव है।
बाबा बागड़ी:जनता को
वैज्ञानिक उपलब्धियों, जानकारियों
एवं शिक्षा से दूर अधिक दिन तक नहीं रखा जा सकता। मानव प्रकृति है, वह अधिक से अधिक
सुविधाजनक जीवन जीना चाहता है, तन एवं मन से स्वस्थ रहना चाहता है जो बिना विज्ञान एवं
तकनीकी ज्ञान के बिना सम्भव नहीं है। और उसके साथ ही ‘ईश्वरीय सत्ता को
मानने की मजबूरी।’ इसके साथ ही
अध्याय संख्या छः समाप्त होता है।
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