रविवार, 21 जुलाई 2013

{ पुस्तक का परिचय एवं प्रथम अध्याय }


{पुस्तक}
बागड़ी बाबा
और
इंसानियत
का धर्म


लेखक-----सत्यशील अग्रवाल

प्रथम संस्करण 2010



(सर्वाधिकार लेखक के पास सुरक्षित हैं)

 मेरठ।

लेखक की कलम से

     आम मानव जीवन किसी न किसी धर्म द्वारा संचालित रहा है। उसके द्वारा नियंत्रित रहा है। बदलते जीवन मूल्यों, जीवन शैली ने इंसान को परम्परागत चले आ रहे रीति-रिवाज, मान्यता, विश्वास को नये सिरे से वर्तमान संदर्भ में सोचने को मजबूर कर दिया है जिस कारण एक असाधारण बदलाव की लहर भी चल पड़ी है। इसी परिवर्तन की लहर को तर्क की कसौटी पर कसने का प्रयास इस पुस्तक में किया गया है। यह विश्लेषण किसी धर्म की अवमानना के उद्देश्य से नहीं किया गया है। लेखक के लिए सभी धर्म सम्माननीय हैं।
आस्था और तर्क का कोई सम्बन्ध नहीं होता। धार्मिक आस्था सिर्फ एक विश्वास है और विश्वास किसी तर्क द्वारा परिभाषित नहीं होता। परन्तु यह भी सत्य है प्रत्येक धर्म का मूल उद्देश्य समाज का कल्याण रहा है ताकि मानव को इंसानियत के दायरे में रखकर समाज को मानव जीवन के अनुकूल बनाया जा सके। परन्तु जब
यही विश्वास अन्धविश्वास का रूप लेकर मानवता का तिरस्कार करने लगे, इंसान को इंसान के प्रति हिंसा के लिए प्रेरित करने लगे, इंसान के मौलिक अधिकारों पर कुठाराघात करने लगे तो यह विश्वास ही अभिशाप बन जाता है। धर्म अपने मूल उद्देश्य से भटक जाता है। लेखक के विचार से इंसानियत का धर्म सभी धर्मों का मूल उद्देश्य है। सभी धर्मों का सार है, आज के वैश्वीकृत युग की आवश्यकता है एवं पूरे विश्व में मान्य हैं अतः धार्मिक विश्वास से भी अधिक महत्वपूर्ण है, इंसानियत के धर्म का पालन किया जाये।
प्रस्तुत पुस्तक के सभी पात्र काल्पनिक हैं। किसी के नाम से मेल खाना सिर्फ संयोग ही माना जाना चाहिये। पाठकों की प्रतिक्रियाएँ सदैव स्वागत योग्य हैं।
-सत्यशील अग्रवाल
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क्या है धर्म ?
           धर्म का मूल अर्थ है धारण करना, अर्थात जो कुछ हम खाते-पीते हैं, पहनते हैं, रहते हैं, समाज से, परिवार से व्यवहार करते हैं, देश के लिए विचार रखते हैं, सब कुछ धर्म है। मानव सृष्टि के आरम्भ में जब मानव ने विकास करना शुरू किया, सोचना-समझना शुरू किया, मानव को समाज के रूप में रहने का ज्ञान मिला, समाज को व्यवस्थित करने की महती आवश्यकता थी। शिक्षा के प्रचार के अभाव में, प्रसार माध्यमों के अभाव में, जनता तक संदेश पहुंचाने का माध्यम अध्यात्म को चुना गया जो विभिन्न धर्मों के नाम से जाने गये। जहाँ कुछ अच्छाईयाँ होती हैं वहाँ कुछ बुराइयाँ भी जन्म ले लेती हैं। इसी प्रकार विभिन्न धर्मों ने जहाँ समाज को व्यवस्था, शान्ति, भाई-चारा प्रदान किया, धार्मिक कट्टरता ने आतंकवाद के रूप में श्राप भी दिया जिसका दंश आज पूरा विश्व झेल रहा है।
        अब समय आ गया है या तो विश्व में धार्मिक कट्टरपन रहेगा अथवा मानव विकास। धार्मिक कट्टरता मानव विकास को पाषाण युग की ओर धकेल देगी।अतः धार्मिक कट्टरता को समाप्त होना ही होगा, यह अनिश्चित है। शिक्षा के बढ़ते प्रभाव और विकास से उत्पन्न सम्पन्नता धार्मिकता और ईश्वरीय सत्ता का अन्त कर देगी। रह जायेगा सिर्फ इंसानियत का धर्मअर्थात् सहिष्णुता, विशालता, शालीनता, सभ्यता द्वारा संसार संचालित होगा। धार्मिक आस्था एक अतीत का विषय रह जायेगी।

-लेखक

आभार अभिव्यक्ति
            विज्ञान एवं इंजीनियरिंग का छात्रा होने के बावजूद लेखों के माध्यम से विचारों का संग्रह करना मेरा शौक रहा है। व्यापारिक गविविधियों एवं परिवारिक जिम्मेदारियों से मुक्त होकर अपने लेखों के संग्रह को प्रकाशित करने की बीड़ा उठाया है। पिछले पाँच वर्षों से जनता के सामने छोटे-छोटे लेखों द्वारा विचार व्यक्त करता रहा हूँ। इस पुस्तक के रूप में साहित्य की रचना मेरा पहला प्रयास है।
                  मेरा जीवन अनेक विसंगतियों एवं विषमताओं से भरपूर रहा है जिसमें मैंने मानसिक, शारीरिक, आर्थिक कष्टों को निर्वाध होकर जिया है। इस दुर्गम जीवन संघर्ष और परिस्थितियों की तीक्षणता से उबरने में सर्वाधिक योगदान मेरे सुपुत्रा अनुज अग्रवाल का रहा है। इस पुस्तक के लिए सहयोग एवं प्रेरणा का मुख्य स्रोत होने के कारण सर्वाधिक श्रेय का पात्रा भी वही है।
               यद्यपि मेरा सम्पूर्ण परिवार इस पुस्तक की रचना के लिए प्रेरणास्रोत बना है सभी परिजनों ने मेरा मार्गदर्शन एवं उत्साहवर्धन किया है, परन्तु मेरी सुपुत्राी भावना अग्रवाल, प्रिय भाई श्री सत्यप्रकाश गर्ग एवं मेरी धर्मपत्नी श्रीमती ऊषा अग्रवाल का सहयोग एवं उनकी प्रेरणा विशेष रूप से उल्लेखनीय है।
               आर.आर. एडवरटाइजिंग के संचालक श्री राकेश कुमार गुप्ता जी, जो मेरे साहित्य गुरू भी हैं, ने अपना अमूल्य सहयोग एवं मार्गदर्शन देकर इस पुस्तक का मुद्रण एवं प्रकाशन सम्भव कराया। उनका मैं आजीवन आभारी रहूँगा।
              प्रस्तुत पुस्तक में पाठकों के समक्ष विभिन्न धर्मों में व्याप्त रुढ़ियों, मान्यताओं का तार्किक विश्लेषण पेश किया है और वर्तमान भौतिकवादी एवं वैश्वीकृत युग में फ्इंसानियत के धर्मय् की महत्ता को प्रस्तुत किया है। मैं अपने उद्देश्य में कितना सपफल रहा हूँ यह तो पाठकगण ही तय करेंगे। यह तो सत्य है कि तर्क के द्वारा विचार अभिव्यक्ति समाज में आवश्यकतानुसार परिवर्तन एवं सुधार लाने की सामर्थ्य रखती है।
-लेखक

      परिचय (प्रमुख पात्र )

 [“प्रस्तुत पुस्तक का मुख्य पात्र बागड़ी बाबा’   एक ऐसे व्यक्तित्व का नाम है जो इंसानियत की प्रतिमूर्ति है। बागड़ी बाबाअपने विद्यार्थी जीवन में अलौकिक प्रतिभा का छात्र रहा है, साथ ही परिवार की पुश्तैनी अपार सम्पदा का मालिक भी। परन्तु सारे सुख वैभव अथवा विलासितापूर्ण जीवन के स्थान पर समाज सेवा एवं सादा जीवन अपनाने का संकल्प लिया। समस्त जायदाद को आश्रमों में स्थानान्तरित कर दीन दुखियों को समर्पित कर दिया।”]
         जय भगवन और फारूख बचपन से ही दोस्त रहे हैं।उनकी स्कूली शिक्षा से लेकर स्नातक की शिक्षा साथ-साथ हुई। उन्होंने आगरा विश्विद्यालय से विज्ञान में स्नातक की डिग्री प्राप्त की। क्योंकि दोनों दोस्त मध्यम दर्जे के विद्यार्थी रहे थे। उच्च योग्यता पाने के लिए प्रयास नहीं किये और अपने भावी जीवन में व्यापार करने की योजना बनायी। दोनों में आपसी विश्वास, ईमानदारी, वफादारी कूट-कूट कर भरी हुई थी। अतः दोनों ने एक साथ ही इलैक्ट्रोनिक्स एलायंस जैसे टी.वी., ओडियो, वीडियो सिस्टम, वाशिंग मशीन इत्यादि का शोरूम खोलने का निर्णय लिया। टैक्निकल कार्य शुरू करने से पहले उसके बारे में ज्ञान एवं अनुभव की आवश्यकता होती है।
             इसीलिए व्यापार प्रारम्भ करने से पहले एक वर्ष का टी.वी. कोर्स स्थानीय प्राइवेट संस्था से करने का निश्चय किया। साथ ही शोरूम के लिए स्थान एवं अन्य औपचारिकताओं के लिए प्रयास भी प्रारम्भ कर दिये। शीघ्र ही शहर के विकसित क्षेत्र में दुकान पाने में सफल हो गये। दुकान किराये पर मिल गयी। दुकान में आवश्यक रिपेयर वर्क और रंगाई-पुताई आदि कार्य प्रारम्भ कर दिये ताकि प्रशिक्षण कार्यक्रम पूरा होते ही व्यापार शुरू किया जा सके। अतः पढ़ाई के साथ-साथ दुकान को तैयार करने का कार्यक्रम भी चलता रहा। प्रशिक्षण का वर्ष पूरा होते ही फर्नीचर बनवाना शुरू कर दिया और वह दिन भी आ गया जब दुकान एक शोरूम के रूप में परिवर्तित हो चुकी थी। दुकान का मुहुर्त किया गया। दोनों दोस्तों की तन्मयता, ईमानदारी और सद्व्यवहार ने व्यापार को लोकप्रिय बना दिया। पूरे शहर में उनकी चर्चा आम हो गयी थी। चर्चा थी उनके छल-कपट रहित एवं धोखाधड़ी विहीन व्यवहार की, उनकी ईमानदारी की एवं तर्कसंगत कीमतों की। दोनों दोस्तों का उद्देश्य अपनी आर्थिक आवश्यकताओं की पूर्ति के साथ-साथ समाज सेवा भी था।  एक दिन जय भगवान कुछ फुर्सत के क्षणों में फारूख से बोला हमारे पड़ोसी डा. ए.के. एन्टनी (एम.डी.) के घर बाबा बागड़ी रूके हुए हैं और शायद कल शाम तक वे अपने आश्रम के लिए प्रस्थान कर जायेंगे
फारूख बोला: मुझे बाबाओं से क्या लेना देना, आये हैं तो आएँ, जाना है तो जाएँ, अगर उन्हें टी.वी. आदि लेना हो तो बात करें।
जय भगवान बोला: बागड़ी बाबा वैसे बाबा नहीं हैं जैसा तुम सोच रहे हो। वे वास्तव में इंसानियत के पुजारी हैं, उन्होंने अपना जीवन जनता के कल्याण के लिए समर्पित किया हुआ है।
फारूख: क्या ऐसे बाबा भी होते हैं?
जय भगवान: जब तुम उनसे मिलोगे और उनके बारे में जानकारी प्राप्त करोगे तो उनके कायल हुए बिना नहीं रह सकते।
फारूख: ऐसा क्या है बाबा बागड़ी में?
 जय भगवान: बाबा ऐसे समाज सेवक हैं जो समाज में बहुत कम देखने को मिलते हैं। मैं तुम्हें उनके बारे में संक्षिप्त रूप से बताता हूँ। बाबा अपने विद्यार्थी जीवन में मेधावी छात्र रहे हैं। परन्तु वे गांधीवाद से काफी प्रभावित थे। अतः स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त कर समाज सेवा करने का संकल्प लिया। उनके पूर्वज गांव के बड़े जमींदार थे, उकने पास अपार सम्पत्ति थी। बाबा सादा जीवन उच्च विचार में विश्वास करते हैं। अतः उन्होंने अपनी पैत्रिक जायदाद को बेचकर अनेक शहरों में सेवालय खोल दिये, जो पूर्णतः गरीबों, असमर्थों, वृद्धों, महिलाओं की सेवा में कार्य कर रहे हैं। उन सेवालयों में बीमार व्यक्तियों के लिए चिकित्सा सुविधा मुफ्त उपलब्ध है, वृद्धों के लिए वृद्धाश्रम है एवं गरीब युवक युवतियों के लिए निःशुल्क विवाह स्थल के रूप में समर्पित हैं। बच्चों की शिक्षा के लिए असमर्थ विद्यार्थियों को बाबा की ओर से सहयोग दिया जाता है। शहर के गणमान्य उद्योगपति व्यापारी बाबा के कार्य में अपना योगदान देते हैं। बाबा के स्वयं के खर्चे नगण्य हैं। शौक के रूप में मानव पीड़ा का हरण करना, उनके जीवन का उद्देश्य बना हुआ है। उनके इस पुनीत कार्य में उनके अनेक अनुयायी उनके साथ जुड़े हुए हें, जो आश्रम के कार्यों में उनका सहयोग करते हैं। अब उनके इस कार्य ने शहर में अभियान का रूप ले लिया है। वे किसी धर्म के प्रचारक नहीं हैं। मानव सेवा और इंसानियत ही उनका धर्म है। वे प्रत्येक धर्म का सम्मान करते हैं। उनका कथन है हम नहीं पूछते तेरा धर्म क्या है? हम पूछते हैं, तेरा दुःख दर्द क्या है?“ उनके अनुयायी अपनी क्षमता और योग्यता के अनुसार तन-मन-धन से उनके इस सद्कार्य में अपना योगदान करते हैं। डा0 एन्टोनी भी अपना दो घंटे का समय आश्रम के चिकित्सालय में आये रोगियों को निःशुल्क परामर्श में देते हैं।
फारूख: जय भगवान क्या मैं भी ऐसे पैगम्बर रूपी बाबा से मिल सकता हूँ।
जय भगवान: जैसा तुम्हें याद होगा डा0 एन्टोनी इंटर तक हमारे साथ ही पढ़ा करते थे। हम लोग बचपन में साथ-साथ खेला करते थे।
फारूख: हाँ याद आया जिसे हम किताबी कीड़ा कहकर चिढ़ाया करते थे।  
जय भगवान: हाँ, वही किताबी कीड़ा आज अपने शहर का नामी-गिरामी डॉक्टर बन चुका है। गांधीनगर में उसने शानदार कोठी बनाई है। हम लोग डॉक्टर के सहयोग से बाबा से मुलाकात कर सकते हैं। क्योंकि डॉक्टर बाबा के पक्के अनुयायी और सहयोगी हैं, उनके द्वारा परिचय कराने से बाबा हमारी जिज्ञासाओं का शान्तिपूर्वक उत्तर देंगे।
फारूख: यह तो एक स्वर्ण अवसर होगा और हमें कुछ सीखने को मिल पायेगा। शायद उनके सहारे हमारा जीवन भी सफल हो जाये।
दोनों मित्रों की सहमति हो जाने पर जय भगवान ने डॉक्टर एन्टोनी से सम्पर्क कर बाबा से अगले दिन प्रातः छः बजे का समय नियत कर लिया। सवेरे जब मित्रगण डॉक्टर के निवास पर पहुँचे, डॉक्टर साहब किसी अस्पताल में विजिट करने के लिए तैयार हो रहे थे। उन्होंने दोनों मित्रों का हार्दिक स्वागत किया। उन्होंने बाबा का अहसान जताया जिनके कारण उन्हें उनके पुराने सहपाठियों से मुलाकात का अवसर मिला। डॉक्टर साहब उनकी बाबा से मुलाकात करने की इच्छा से बहुत प्रभावित थे।
डॉक्टर एन्टोनी: बाबा अभी योग क्रिया में लीन हैं, अतः कुछ समय प्रतीक्षा करनी होगी। जब तक हम लोग गपशप करते हैं। डॉक्टर साहब ने अपने घरेलू नौकर से चाय नाश्ते का बंदोबस्त करने का आदेश दिया।
जय भगवान: अरे एन्टोनी आप तो कहीं जाने के लिए तैयार हो रहे थे। हम लोग आपका समय व्यर्थ कर रहे हैं।
डॉक्टर एन्टोनी: दोस्तों का आगमन कभी-कभी होता है और आप लोगों से कम से कम दस वर्ष बाद मुलाकात हो रही है। अस्पताल कुछ देर से चला जाऊँगा। तीनों मित्र बातचीतों में इतना व्यस्त हो गये कि समय का पता ही न चला। नौकर ने आकर सूचना दी कि बाबा योग क्रिया समाप्त कर चुके हैं। डॉक्टर साहब तुरंत उठकर मित्रों को बाबा से मिलवाने के लिए ले गये और बाबासे जय भगवान एवं फारूख को अपने घनिष्ठ मित्र कहकर मिलवाया। उन्होंने बाबा को अपने मित्रों का नेकदिल, ईमानदार, समाज सेवा के इच्छुक इंसानों के रूप में परिचय दिया और बाबा से उनकी जिज्ञासाएँ शांत करने की प्रार्थना की।
बागड़ी बाबा: मुझे आप लोगों से मिलकर प्रसन्नता हुई और यह जानकर कि आप लोगों की समाज में व्याप्त कष्टों को दूर करने की भावना है, ने मुझे अत्यन्त प्रभावित किया। हमारे देश को, हमारे समाज को निःस्वार्थ स्वयं सेवकों की महती आवश्यकता है। आप लोग आसन ग्रहण करें और अपने प्रश्नों द्वारा अपनी जिज्ञासा शांत करें।
फारूख ने प्रश्न किया: बाबा जैसा मैंने आपके बारे में सुना है आप एक
योग्य एवं मेधावी छात्र रहे हैं, परिवार से भरपूर सम्पन्न रहे हैं। आप एक अच्छे उद्योगपति अथवा प्रशासनिक अधिकारी बनने की क्षमता रखते थे, फिर भी अपना जीवन जनता के लिए कुर्बान कर दिया। सादा जीवन उच्च विचार को अंगीकार किया, आखिर ऐसा फैसला क्यों लिया? आप तो जीवन के सब सुख प्राप्त करने के हकदार थे।
बाबा बागड़ी: दीन दुखियों की सेवा से बड़ा कोई और सुख हो ही नहीं सकता। अतः मैं अपने को सबसे भाग्यशाली एवं सुखी मानता हूँ। जो आनन्द सादा जीवन जीने में है, वह भौतिकवादी सुखों एवं सुविधाओं में नहीं होता। विलासी व्यक्ति मानसिक रूप से अधिक अशांत रहता है। यदि कभी उन सुविधाओं का अभाव झेलना पड़े तो विचलित हो जाता है और उसे कष्टों का अहसास होता है।
फारूख: क्या आप अपने धर्मविहीन इंसानियतका धर्म का हमें परिचय  करायेंगे
बाबा बागड़ी: तुम्हारे इस प्रश्न का उत्तर चन्द घंटों या चन्द दिनों में देना सम्भव नहीं है। डॉक्टर साहब के मित्र होने के नाते मैं तुम्हें सब कुछ विस्तार से बताऊँगा, यदि तुम लोग पर्याप्त समय मुझे दे सको और मेरे आश्रम पर आकर मेरे विचारों को जान सको।
जय भगवान: बाबा हमें खुशी होगी यदि आप हम पर इतनी कृपा करेंगे। हम लोग आपकी सुविधा के अनुसार समय निकाल कर आपके आश्रम पर आ सकते हैं, यह तो हमारा सौभाग्य होगा।
फारूख: जी बाबा, हम लोग आपके आदेश का पालन करेंगे।
जय भगवान: बाबा, हम लोगों की सोमवार की व्यापार से छुट्टी रहती है
अतः उस दिन किसी भी समय आप हमें बुला लें।
बागड़ी बाबा: मेरे लिए सप्ताह के सातों दिन व्यस्त होते हैं परन्तु आप लोगों को आप लोगों की सुविधानुसार सोमवार को सवेरे योग कक्षाओं के पश्चात् अर्थात सात बजे से आप लोगों के लिए समय दे दिया करूँगा। दोनों युवा बाबा की स्वीकृति पाकर अत्यन्त प्रसन्न हुए। डॉक्टर एन्टनी ने इस बीच अपने दोस्तों से विनयपूर्वक विदा ली क्योंकि वे पहले ही काफी लेट हो चुके थे। मरीजों से अधिक प्रतीक्षा करवाना उचित नहीं है। उन्होंने अपने नौकर रामू से अपने दोस्तों और बाबा की मेहमान नवाजी करते रहने को कहा।
बाबा बागड़ी: यहाँ पर आज मैं अपना संक्षिप्त परिचय आप लोगों को देता हूँ, ताकि आज से ही आप मेरे से जुड़ सकें।
मेरे पिता अपने गांव में नामी एवं बड़े जमींदार थे। उनके पास अनेकों खेत एवं बाग थे वे सब उन्हें पैत्रिक सम्पत्ति के रूप में प्राप्त हुए थे। अतः मेरा बचपन सम्पूर्ण सुविधाओं के साथ बीता। मैं अपने विद्यार्थी जीवन में अपनी कक्षा में मेधावी छात्रों में गिना जाता था। ईमानदारी, सत्यता और सादा जीवन मेरे उच्च विचारों की धारणा के पोषक थे। मैं अक्सर गरीबों, दीन-दुखियों, आपदाग्रस्त व्यक्तियों को देखकर विचलित हो जाता था।
हाईस्कूल की शिक्षा के पश्चात् गांधी जी द्वारा लिखित साहित्य को पढ़ने का अवसर मिला। मैं उनके अहिंसा के सिद्धान्त से बहुत प्रभावित हुआ। उनके समाज सेवा, सत्य, राष्ट्रप्रेम, छुआछूत निवारण जैसे भावों से अत्यधिक प्रभावित हुआ। फलस्वरूप मैंने निश्चय कर लिया कि अपनी शिक्षा समाप्त कर देश और समाज की सेवा करूँगा। सत्य, अहिंसा, ईमानदारी, उदारता जैसे गुणों को आत्मसात करूँगा। अतः स्नातकोत्तर की समाजशास्त्र में उपाधि प्राप्त कर अपना सर्वस्व समाज को न्यौछावर कर दिया। मैं अपने पिता की अकेली संतान था। अतः उनके देहान्त के पश्चात् सारी जमा पूंजी को समाज सेवा के लिए लगा दिया। खेत खलिहान बेचकर अनेक शहरों में बागड़ी आश्रम बनवा दिये और उनमें मुफ्त चिकित्सालय खोल दिये। वृद्धों एवं अनाथ बालकों के रहने की व्यवस्था की। प्रत्येक आश्रम में गरीब युवक युवतियों के विवाह आयोजन की व्यवस्था कर दी गयी। गरीब बच्चों की शिक्षा का खर्च भी समय-समय पर आश्रम द्वारा उठाया जाता है। मेरे इस शुभ कार्य से प्रभावित होकर जहाँ-जहाँ आश्रम स्थित हैं वहाँ भी और उसके आसपास शहरों से अनेक सामर्थ्यवानों ने अपना तन-मन-धन से सहयोग देना प्रारम्भ कर दिया। डॉक्टरों ने फ्री मरीजों के देखने के लिए समय दिया, शिक्षकों ने गरीब बच्चों को ट्यूशन देकर उनकी सहायता करने का संकल्प किया, कुछ विद्वान एवं समर्पित लोगों ने आश्रम का संचालन अपने हाथ में लिया। वहीं धनवान व्यक्तियों, उद्योपतियों, अफसरों ने आर्थिक योगदान का प्रस्ताव रखा और आज इतना बड़ा कारवाँ बन चुका है कि तुम जैसे व्यवसायी भी मेरी ओर उन्मुख होकर मेरे सिद्धांतों एवं कार्यशैली जानने के इच्छुक हो गये।
जय भगवान: बाबा क्या आप संन्यासी बन गये हैं, बृह्मचारी हैं? आपने अपना घर भी नहीं बसाया क्या?
बाबा बागड़ी: समाज सेवा के लिए ब्रह्मचारी अथवा सन्यासी बनना आवश्यक नहीं है। महान उद्देश्य का संकल्प लेना ही समाज सेवा के लिए काफी होता है। परिवार बनाना उसका यथा शक्ति पालन करना भी समाज सेवा का ही छोटा रूप है। साधुओं-सन्यासियों को सन्देह के घेरे में लाने की सम्भावना भी बनी रहती है। आज अच्छाईयां को दबाने के लिए अनेक नकारात्मक तत्व उभर कर आते रहते हैं। मैंने समय पर विवाह किया और आज मेरे दो पुत्र बड़े हो चुके हैं। वे अपनी पढ़ाई के अतिरिक्त समय को मेरे कार्यों में सहयोग करते हैं। मेरी पत्नी भी सच्ची समाज सेविका है और मुझे मेरे कार्यों के लिए प्रोत्साहित करती है। वे अक्सर नारी शोषण के खिलाफ आवाज उठाती रहती हैं और नारी उत्थान के प्रयास करती रहती हैं और आज की बैठक यहीं समाप्त होती है। जैसा तुम जानते हो मेरा मुख्य आश्रम यहाँ से पांच किमी पर स्थित है। अगले सोमवार आप लोग वहीं पर मुझसे मुलाकात करेंगे।
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अध्याय एक

   { इस सृष्टि का जन्म कैसे हुआ, कब हुआ, क्यों हुआ आज भी रहस्य के अन्धेरे में है। यदि यह मान लिया जाये कि सृष्टिकर्ता ईश्वर है तो ईश्वर की उत्पत्ति भी अबूझ पहेली है।}

आदि मानव का इतिहास
          फारूख एवं जय भगवान बाबा द्वारा दिये गये समय पर बाबा के आश्रम पहुंच गये, समय था प्रातः 6.45। अभी बाबा अपने शिष्यों को योगाभ्यस करा रहे थे। दोनों दोस्त चुपचाप बाबा का योगाभ्यास के कार्यक्रम से फ्री होने की प्रतीक्षा करने लगे। ठीक सात बजे बाबा ने आकर दर्शन दिये, दोनों दोस्तों ने अभिवादन किया और प्रश्नसूचक मुद्रा में बाबा के संदेश का इंतजार करने लगे।
बागड़ी बाबा: आज हम आप लोगों को प्रथम अध्याय से अपना संदेश कार्यक्रम प्रारम्भ करते हैं और जय भगवान से पूछते हैं, तुम बताओ क्या इंसान जिस रूप में आज हमें-आपको नजर आता है, मानव सृष्टि प्रारम्भ काल में भी ऐसा ही था?
जय भगवान: बाबा जी, जैसा कि मैंने प्रारम्भिक कक्षाओं में पढ़ा है, उसके अनुसार तो इंसान और जानवर में कोई फर्क नहीं था। मानव भी अन्य जानवरों की भांति कन्दमूल फल खाता था और बंदरों की भांति पेड़ों पर रहता था, जंगलों में घूमता था और कन्दराओं में रहना सीख रहा था। इतिहास के पन्नों पर पाषाण युग का वर्णन करते हुए बताया गया है, इस युग में मानव ने पत्थरों से आग जलाना, मांस भूनकर खाना और पेड़ांे की छाल या पत्ते बदन को ढकने के लिए प्रयोग में लाने लगे थे।
बाबा बागड़ी: बिल्कुल ठीक कहा बेटा तुमने और यहीं से हम प्रथम अध्याय का प्रारम्भ कर रहे हैं। इस सृष्टि का जन्म कैसे हुआ, कब हुआ, क्यों हुआ कुछ ऐसे प्रश्न है जिनके उत्तर न तो आज तक मिल पाये हैं और न ही आगे कोई संतोषजनक तर्क संगत उत्तर मिलने की सम्भावना है। जो भी इन प्रश्नों का उत्तर देते हैं वे सिर्फ कल्पना के घोड़े दौड़ाते हैं। ठोस उत्तर किसी के पास नहीं है। परन्तु यह तो निश्चित है इंसान उत्पत्ति काल में कैसा था और पाषाण युग उसकी विकास यात्रा की प्रथम सीढ़ी थी। परन्तु फारूख क्या यह बता सकते हो सिर्फ मानव ही विकास क्रम में प्रवेश कर पाया, अन्य जीव आज भी यथावत स्थिति में है क्यों?
फारूख: बाबाजी, मानव एवं अन्य जीवों में मुख्य अंतर है, मानव का मस्तिष्क, मानव का मस्तिष्क विकास करने की क्षमता रखता है, वह सोच सकता है, विचार करके अपनी परिस्थितियों में परिवर्तन ला सकता है जबकि अन्य जीवों में मस्तिष्क तो होता है, परन्तु अपने दैनिक कार्यों तक सीमित होता है, उनकी विचार शक्ति, परिवर्तन लाने की क्षमता नहीं रखती। उसी अद्भुत विकास क्षमता के कारण मानव ने अपने लिए अपार सुविधाएं जुटा लीं और आज भी निरंतर विकास  की ओर उन्मुख है।
बाबा बागड़ी: तुम दोनों दोस्त वाकई बुद्धिमान हो, और मुझे आशा है तुम्हें समय देकर मेरी मेहनत बेकार नहीं जायेगी, तुम मेरे लिए कारगर शिष्य साबित होगे। हाँ, तो अपने विषय पर लौटते हुए सिर्फ मानव दिमाग ने जो कभी आसमान में चमकती बिजली से भयभीत हुआ, कभी वर्षा की जानकारी लेने का प्रयास किया, अन्य जीवों के बारे में सोचा समझा, गर्मी और जाड़े की पहेली समझने की कोशिश की तो कभी जंगलों में अनेकों पेड़ पौधों के बारे में सोचा समझा।
            अनेक प्रश्नों के उत्तर उसके लिए उलझन पैदा करते रहे। बहुत से प्रश्न तो आज तक भी अनसुलझे हैं। इन अनसुलझे प्रश्नों के उत्तर के रूप में उसने एक अज्ञात-अदृश्य   शक्ति की कल्पना कर डाली। अनसुलझी घटनाओं और परिस्थितियों के लिए उसे जिम्मेदार मानकर अपने मन की जिज्ञासा शांत की।  
      अब इस अदृश्य शक्ति की कल्पना  को भिन्न-भिन्न स्थानों पर, अलग-अलग देशों में पृथक रूपों और पृथक नामों से जाना गया। कहीं पर वह देवता, शिव पार्वती, राम, अल्लाह के नाम से जाना गया तो कहीं पर गौड़ के रूप में उसे देखा गया। सभी ने अपने इष्ट देव को विभिन्न आकृतियों में जाना। सबके पूजा-अर्चना, नमाज, प्रेयर आदि के ढंग भी अलग ही रहे। इष्ट देव की मान्यताओं के ढंग भी अलग ही रहे। इष्ट देव की मान्यताओं के अनुसार धर्म भी अलग-अलग नाम से जाने गये। धर्म के प्रवर्तक और अनुयायियों एवं प्रचारकों ने अपने वर्ग, अपने समाज, देश की कानून व्यवस्था, मानव जीवनचर्या को नियंत्रित करने का भार भी अपने ऊपर ले लिया। समुचित साधनों के विकास के अभाव में यह एक चुनौती भरा कार्य था परन्तु धर्माधिकारी अपने इस शुभ कार्य में सफल हुए। क्योंकि शिक्षा के अभाव में जनता को व्यवस्थित करना, उन्हें समाज में शान्ति-अहिंसा एवं कर्त्तव्यों का पाठ पढ़ाना आसान कार्य नहीं था। उन्होंने धर्म के सहारे मानव को इंसानियत का पाठ पढ़ाया। उनके उद्देश्य महान थे। परन्तु कालान्तर में उनके बताये गये दिशा-निर्देशों का दुरूपयोग शुरू कर दिया गया, कुछ नियमों का अर्थ का अनर्थ बना दिया गया। कुछ कायदे-दिशा-निर्देश विकास के साथ अपरिहार्य हो गये।
        उपरोक्त सभी कारणों से समाज ने अनेकों भ्रांतियों-रूढ़ियों-आडम्बरों को जन्म दिया। अनेकों प्रकार की विसंगतियाँ उत्पन्न हो गयीं। जिन्होंने समाज को कष्टप्रद जीवन जीने को मजबूर कर दिया। अनेक कुप्रथाओं के चंगुल में समाज फंसता चला गया। सती प्रथा, बाल विवाह, दहेज प्रथा, धार्मिक कट्टरता, नारी शोषण, तान्त्रिक  शोषण, छुआछूत जैसी परम्पराओं से समाज कराह उठा।राजा राम मोहन राय, स्वामी विवेकानन्द, दयानन्द सरस्वती, महात्मा गांधी, भीमराव अम्बेडकर जैसे अनेक महापुरुषों ने समाज के दर्द को समझा और यथा शक्ति भरपूर प्रयास कर समाज में सुधार लाये। परन्तु अभी भी बहुत सारी विकृतियाँ समाज में विराजमान हैं, जिन्हें सुधारने की आवश्यकता है। अतः आज के वैज्ञानिक युग एवं विकसित सामाजिक स्थिति में प्रत्येक धर्म में प्रचलित परम्पराओं का तर्कसंगत एवं समाज के हित में विश्लेषण करने की आवश्यकता है। ताकि विसंगतियों, रूढ़ियों, आडम्बरों से समाज मुक्त हो सके और मानव विकास के रथ पर तेज दौड़ लगा सके। इसके साथ ही बाबा बोले आज हम अपने संदेश को यहीं विराम देते हैं। अगली बैठक (मीटिंग) में फिर मिलेंगे। फारूख और जय भगवान दोनों बाबा को प्रणाम कर अपने अपने घर लौट गये। कुछ समय पश्चात जब दोनों अपने शोरूम पर पहुंचे तो दोनों दोस्तों में गजब का उत्साह था, उन्हें बाबा द्वारा किया गया वार्तालाप बहुत पसन्द आ रहा था। वे उनसे अपनी मुलाकात को अपना सौभाग्य मान रहे थे। वे दोनों इतने प्रभावित थे कि उन्हें बाबा के आश्रम में रहकर सेवा करने की इच्छा हो रही थी। परन्तु वे अपने कारोबार एवं पारिवारिक जिम्मेदारियों से बंधे हुए थे। अतः प्रत्येक सोमवार को मुलाकात बनाये रखने का ही विकल्प उनके पास था।
विभिन्न धर्मों का उद्भव
          यद्यपि पाषाण युग  के पश्चात् धर्मों  के उद्भव  तक के सफर को र्काइे  विशेष  इतिहास उपलब्ध नहीं है। सिर्फ कल्पना से ही सोचा  समझा जा सकता है। प्रस्तुत  है बाबा के इस सम्बन्ध में  अपने उद्गार। आज फारूख आरै जय भगवान जब बाबा के आश्रम में  पहुंचे  तो बाबा उन्हीं की प्रतीक्षा  कर रहे थे।उन्होंने दोनों  का भरपूर  स्वागत किया। बाबा भी इन दोनों शिष्यों लेकर  काफी उत्साहित थे। 
 बाबा ने अपना वार्तालाप प्रारंभ करते हुए कहा:

बाबा बागड़ी: धर्मों के उद्भव के बारे में विचार करने से पहले हमें मानव की पाषाणयुग से धर्मों के उद्भव काल तक की विकास यात्रा का अध्ययन करना होगा, जो सिर्फ कल्पना पर ही आधारित है परन्तु तर्क पर आधारित है। सर्वप्रथम पत्थर से आग उत्पन्न कर मांस भून कर खाना, पेड़ों की छाल और पत्तों से बदन ढकना पाषाण युग तक का विकास है। उसके पश्चात् आपसी बातों को एक-दूसरे तक धीरे-धीरे भाषाओं के रूप में विकसित हो गये। विचारों का आदान-प्रदान मानव विकास की महत्वपूर्ण एवं आवश्यक कड़ी थी। भिन्न-भिन्न स्थानों पर भिन्न-भिन्न भाषाओं का विकास हुआ और एक दूसरे के विचार जानने, बतलाने की योग्यता प्राप्त कर ली। उसके पश्चात् प्राकृतिक घटनाओं को सोचने समझने का प्रयास किया गया। कुछ  घटनाएं समझ आयीं तो कुछ को अपनी कल्पना से विश्लेषण किया और कल्पना की किसी अदृश्य शक्ति की अथवा ईश्वर की। भाषाओं के विकास की भांति ईश्वर को भी भिन्न नामों से जाना गया। जब तक मानव ने खेती बाड़ी करना सीख लिया था, अपने समूह में परिवार को इकाई का रूप देना प्रारम्भ कर दिया और भिन्न नदियों अथवा जल स्रोतों के करीब अपने रहने के लिए मकान (झुग्गी-झोंपड़ी) बनाने शुरू कर दिये और समूह को बस्ती का रूप मिल गया।
       मानव ने समूह में मिलकर सभी जीवों को मार डाला अथवा मारने की योग्यता प्राप्त कर ली। कुछ को अपने कब्जे में करना सीख कर अपने लाभ के लिए उनका उपयोग किया। गाय, भैंस, भेड़, बकरी, गधे, घोड़े, ऊँट, हाथी आदि इसी प्रकार के जीवों में आते हैं। जो मानव के लिए नुकसानदायक थे उन्हें नष्ट कर दिया अथवा अपनी बस्ती से खदेड़ दिया। सभी जीवों को नियंत्रित करने के पश्चात समस्या थी, मानवीय व्यवहार को नियंत्रित करने की क्योंकि मानव के पास दिमाग होने के कारण प्रत्येक व्यक्ति का व्यवहार भी भिन्न-भिन्न होता है। सबको साथ मिलकर शांतिपूर्वक रहने के लिए कुछ नियमों का निर्माण कर उन्हें लागू करने की बाध्यता थी।
        ईश्वर के रूप में उसे अभेध अस्त्र प्राप्त हो चुका था और उन्होंने मानव को अपने समाज में रहने के लिए कुछ नियम बनाये और ईश्वर द्वारा बताया गया निर्देश माना गया। जैसे हिंसा न करो, सबके साथ प्यार से रहो, अपने बच्चों और परिवार को पालने की जिम्मेदारी निभाओ, ईश्वर से डरो। उसके कहर से बच नहीं सकते, तुम्हारे सारे कार्य उसकी नजर से बच नहीं सकते। अतः अपने क्रियाकलापों पर नियंत्रण करो, आदि अनेक नियम बनाकर एक धर्म का रूप दे दिया गया। धर्म का वास्तविक अर्थ है- धारण करना अर्थात अपनी जीवन चर्या को एक व्यवस्थित रूप देना।
         ये विभिन्न धर्म ही समाज को जब भी नियंत्रित करते रहें, जब मानव के पास अपराध रोकने के पर्याप्त साधन नहीं थे और आज के हाईटैक युग में भी अपना दखल बनाये हुए हैं। जबकि आज समाज को नियंत्रित करने के लिए अनेकों कानून विद्यमान हो चुके हैं। ईश्वर की वाणी, संदेश के रूप में एकत्र कर प्रत्येक धर्म ने अपने ग्रन्थों की रचना की जिसमें मानव को उसके प्रत्येक कार्य (अवस्थानुसार- आवश्यकतानुसार) के लिए निर्देशित किया गया और मानव जीवन सुलभ कराया। यह भी एक रोचक तथ्य है धार्मिक उद्भव का इतिहास अधिकतम पांच हजार वर्ष पुराना है जबकि पृथ्वी पर सृष्टि का आगमन लाखों वर्ष पूर्व माना जाता है और पृथ्वी का निर्माण काल करोड़ों वर्ष पूर्व माना गया है। स्पष्ट है धर्म का उद्भव उसी समय सम्भव हुआ जब मानव ने भाषा का विकास पूर्ण रूपेण कर लिया, रहने और खाने की व्यवस्था करना सीख लिया अन्य जीवों पर विजय प्राप्त कर ली। उसके पश्चात ही उसे मानव समाज को नियंत्रित करने और अपने विकसित दिमाग को शांत करने का मार्ग खोजना सम्भव हुआ।
 जय भगवान: क्या हमारे पास लगभग पांच हजार पूर्व तक का ही इतिहास उपलब्ध है। उससे पूर्व सिर्फ कल्पनाओं एवं वैज्ञानिक तर्कों पर आधारित इतिहास है?
बाबा बागड़ी: इतिहास एक संचित ज्ञान एवं जानकारी होती है जो बिना लेखन सामग्री एवं लेखन योग्यता (भाषा का विकास, लिपि का विकास) के बिना सम्भव नहीं होता और यह भी सत्य है प्राचीनतम ग्रन्थों में धार्मिक ग्रन्थ ही उपलब्ध हैं। आज भी देसी इलाजों का मुख्य स्रोत आयुर्वेदमाना जाता है जिसमें विभिन्न जड़ी बूटियों के सेवन से मानव स्वास्थ्य रक्षा के उपाय सुझाए गये हैं। यहाँ पर ग्रन्थों का अध्ययन करना अपने मुख्य विषय से हटना होगा। अतः संदर्भ में इतना ही बताना काफी है। हिन्दू धर्म के ग्रन्थ विश्व में प्राचीनतम ग्रन्थ माने जाते हैं जिन्होंने धर्म, ईश्वर और अध्यात्म के विषय में जानकारी उपलब्ध करायी है। साथ ही साथ मानव व्यवहार उसकी जीवनशैली और स्वास्थ्य रक्षा के उपायों का वर्णन भी संचित है। ईसाई धर्म का इतिहास लगभग दो हजार वर्ष पूर्व स्थापित माना जाता है। जबकि इस्लाम धर्म लगभग डेढ़ हजार वर्ष पूर्व स्थापित माना जाता हैबौद्ध धर्म, जैन धर्म भी समकालीन माने जा सकते हैं, सिख धर्म का इतिहास सिर्फ लगभग छः सौ वर्ष पुराना है। विश्व में और अपने देश में अनेक अन्य धर्म भी मौजूद हैं जिनमें अलग-अलग परम्पराएं, मान्यताएं हैं। मानव समाज धर्मों एवं  धर्माधिकारियों द्वारा निर्देशित एवं नियन्त्रित होते रहे। यद्यपि विश्व स्तर पर धर्मों का प्रभाव आपसी सम्बन्धों को पुष्ट करने के लिए बाधित नहीं रहा है। अब मानव ने अपने व्यवहार को धर्मों से जोड़ने की प्रवृत्ति छोड़ दी है। विश्व स्तर पर विकास करने के लिए यह आवश्यक भी हो गया है। सिर्फ मानवीयता या इन्सानियत की धारणा जन्म ले रही है। आज की चर्चा यही पर समाप्त करता हूँ।      क्रमशः जारी है.......... 
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