शनिवार, 19 अक्टूबर 2013

{अध्याय द्वितीय} धर्मों के माध्यम से सामाजिक नियन्त्रण



[प्राचीनकाल में धर्मों के माध्यम से ही सामाजिक नियन्त्रण सम्भव हुआ। मानव स्वास्थ्य से सम्बन्धित प्रत्येक लाभप्रद वस्तु को धार्मिक रूप देकर आम जनता में लोकप्रिय बनाया गया।]
           जय भगवान् और फारूख अपने शो रूम पर बैठकर भी बाबा से हुई मुलाकात और  चर्चा को याद करते रहते थे। वे अपने अनुभव अपने स्टाफ यानि रमेश, राजेन्द्र एवं नसीम जो सभी टैक्निशियन थे, से बांटते थे। उनके लिए स्टाफ उनके परिवार के सदस्य के रूप में थे। सभी बहुत ईमानदार और नेक इंसान थे, बिल्कुल अपने मालिकांे की तरह। उन्हें सिर्फ अपने वेतन से ही सन्तुष्टि थी। वे भी अपने मालिकों की ईमानदारी, सभ्यता, पारदर्शिता, शालीनता से बहुत प्रभावित थे। यही कारण उन्हें यहाँ कई वर्षों से रोके हुए था। जब मालिक लोग बागड़ी बाबा की चर्चा करते थे, वे लोग बड़े ध्यान से उनकी बातें सुनते थे। उन्हें बाबा के बारे में बातें सुनना बहुत पसन्द आता था। फारूख ने उन लोगों की दिलचस्पी देखते हुए उन लोगों से वादा किया जो भी वे सुनकर आयेंगे आप लोगों को बता दिया करेंगे।

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फारूख: अब की बार सोमवार को कम्पनी के ऑफिस भी जाना है, वहाँ माल का ऑर्डर, रिप्लेसमेंट के बारे में चर्चा एवं पेमेण्ट आदि अनेक कार्य करने हैं। जय भगवान क्या इस हफ्ते बाबा बागड़ी के पास जाना स्थगित करना पड़ेगा।
जय भगवान: हम लोग ऐसा भी कर सकते हैं, सवेरे जल्दी कम्पनी के ऑफिस जाकर, संध्या पांच बजे तक लौट आयें और बाबा से संध्या समय वार्तालाप का समय नियत कर लें।
फारूख: क्या बाबा शाम का समय दे देंगे? क्या उनके पास समय खाली होगा?
जय भगवान: बाबा से आज ही फोन पर बातें करके अपना आग्रह करेंगे यदि मान गये तो एक सोमवार खाली नहीं जायेगा।
फारूख:हाँ तुम्हारा विचार सही है। जय भगवान ने फोन पर बाबा से निवेदन किया तो बाबा ने स्वीकार कर लिया। अगले दिन सोमवार संध्या सात बजे बाबा ने चर्चा आरम्भ की।
बाबा बागड़ी: आज हम द्वितीय अध्याय प्रारम्भ करने जा रहे हैं। इस अध्याय द्वारा हम विभिन्न धर्मों के संस्थापकों ने जो नियम, मानव दिनचर्या के लिए बनाये, उन्होंने क्या करना चाहिये और क्या नहीं करना चाहियेके दिशा-निर्देश स्थापित किये, का विश्लेषण करेंगे। इस अध्याय में सिर्फ वे नियम अध्ययन के लिए चुन रहे हैं जो मानव हित में आज भी समय की कसौटी पर खरे उतरते हैं यदि उन्हें तार्किक रूप से समझा जाये और उसके पीछे छिपे उद्देश्य को पहचाना जाये। प्राचीन स्थापित मान्यता आज भी मानव समाज को लाभप्रद साबित हो सकती है। जय भगवान बेटा बताओ तुम गंगा में स्नान करने जाते हो?
जय भगवान:बचपन में अपने ननिहाल से अनेकों बार अनेक पर्वों पर नहाने जाते थे, क्योंकि गंगा जी ननिहाल से कुछ किमी पर ही थी। उस समय गंगा जल आज की भांति गंदा और काला नहीं होता था परन्तु अब तो मुझे गंगा स्नान किये हुए दस वर्ष से अधिक हो चुके हैं। बाबा क्या वास्तव में उसमें स्नान करके पापों से छुटकारा मिलता है?

                        गंगा स्नान से पापों से मुक्ति

बाबा बागड़ी:गंगा में स्नान वास्तव में मानव स्वास्थ्य के लिए लाभप्रद है। वैज्ञानिक शोधां से ज्ञात हुआ है गंगा जल जो गंगोतरी से आता है उसमें अनेक रासायनिक तत्व मौजूद हैं जो मानव को अनेक त्वचा रोगों और पेट के रोगों से मुक्ति दिलाने में सक्षम हैं।  
परन्तु गंगा जैसे-जैसे मैदानों में उतरकर आगे बढ़ती है इसमें विभिन्न कल कारखानों   का कचरा अथवा रासायनिक द्रव और विभिन्न बस्तियों से मलमूत्र विसर्जित किया जाता है जिसने गंगा जैसी पवित्र नदी के जल को पूर्णतया प्रदूषित कर दिया है। गंगा नदी एक गंदे नाले के रूप में बदलने लगी है। अतः इस प्रदूषित जल में स्नान करना और पीना स्वास्थ्य कर नहीं हो सकता। शायद आगे चलकर तो इसे छूना भी अपने को संक्रमित कर लेना होगा।अतः यदि प्रकृति के इस अनमोल तोहफे का लाभ लेना है तो सिर्फ आस्था मात्र से लाभ नहीं चलेगा। प्रत्येक आस्थावान और सचेत व्यकित को गंगा को अशुद्ध करने वाले कारकों से जूझना पड़ेगा और स्वयं भी इस जल को प्रदूषित न करने का संकल्प लेना होगा।गंगा का जल यदि वास्तविक रूप में प्राप्त हो तो गंगा स्नान का अर्थ होगा प्रकृति की गोद में स्नान कर स्वास्थ्य लाभ करना। स्वास्थ्य लाभ ही मानव के लिए सबसे बड़ी पाप से मुक्ति के समान है। प्रकृति की गोद में स्नान का अर्थ है, प्रकृति के पांचों तत्वों का यानि अग्नि, पृथ्वी वायू, जल और आकाश का मिलन जो प्राकृतिक चिकित्सा में महत्वपूर्ण माना गया है। तुलसी का पौधा प्रत्येक हिन्दू के घर में विद्यमान होता है, उसकी पूजा अर्चना की जाती है। जय भगवान तुम्हारे घर आंगन में भी तुलसी महकती होगी।
जय भगवान: जी बाबा, मैंने एक बड़ी सी होदी में बहुत बड़ा पौधा लगा रखा है, हम तो उसके पत्ते चाय में डालकर भी पीते हैं। अनेक रोगों में इसके पत्तों का उपयोग करते हैं। मेरी दादी मां इसके पत्तों को दवा के रूप में प्रयोग करना जानती हैं

तुलसी को देवी रूप में पूजा जाता है
बाबा बागड़ी: हिन्दू धर्म की मान्यता के अनुसार प्रत्येक घर में तुलसी का होना शुभ माना जाता है और सुबह-शाम इसकी पूजा अर्चना का भी विधान है। वैज्ञानिकों ने जब इस मान्यता का अध्ययन किया तो उन्हें चौकाने वाले परिणाम मिले। तुलसी का पौधा इतनी ऑक्सीजन उत्सर्जित करता है जिससे पूरे परिवार की ऑक्सीजन आवश्यकताएं पूर्ण होती हैं और आसपास का वातावरण भी शुद्ध होता है। यह हमारे पूर्वजों की एक नायाब खोज है। जो मानव स्वास्थ्य के लिए वरदान है। सवेरे शाम पूजा अर्चना का अर्थ है हम उसके सानिध्य से अधिक ऑक्सीजन ग्रहण कर सकें। एक और चमत्कार इस पौधे में है यह विद्युत का सुचालक होता है तथा आसमान में उपस्थित तड़ित विद्युत भवन पर नहीं गिरती, बल्कि तुलसी के पौधे के माध्यम से पृथ्वी में समा जाती है और भवन को विद्युत से हानि नहीं होती। तुलसी के पत्ते के बीज अनेक रोगों से मुक्ति दिला सकते हैं। तुलसी के पत्तों का एक निश्चित मात्रा में नियमित सेवन इंसान के शरीर में रोगों से लड़ने की क्षमता बढ़ाता है। चरणामृत में तुलसी का प्रयोग इसी कारण से बताया गया है। तुलसी से चिकित्सा एक गहन विषय है। अतः वर्तमान युग में भी तुलसी के महत्व को अस्वीकार नहीं किया जा सकता। जिसे ऋषि मुनियों ने धार्मिक आस्था का विषय बनाकर अपरोक्ष रूप से मानव को स्वस्थ रहने का मार्ग उपलब्ध करा दिया। जब इंसान को तुलसी के उपयोग से लाभ होगा तो उसकी आस्था उसकी पूजा-अर्चना में दृढ़ होती है और धर्म संचालकों को अपने उद्देश्य में सफलता प्राप्त होती है। समाज की सेवा का संतोष लाभ भी प्राप्त होता है।
फारूख: बाबा क्या मैं भी अपने घर पर तुलसी का पौधा लगा सकता हूँ।
बाबा बागड़ी: बेटा तुलसी के पौधे का लाभ मानव मात्र के लिए नहीं है। उसके लाभ धर्म को देखकर नहीं होते। प्रत्येक धर्म के अनुयायी तुलसी के पौधे का पूरा-पूरा लाभ पा सकते हैं। स्वास्थ रहना प्रत्येक मानव का जन्म सिद्ध अधिकार हैं
फारूख: बाबा आपने तो मुझे एक वरदान दे दिया। अपने घर वालों की सहमति लेकर मैं भी अपने घर में तुलसी का पौधा लगाऊँगा।

सूर्य नमस्कार


बाबा बागड़ी: अब हम आगे बढ़ते हैं सूर्य नमस्कारकी मान्यता की ओर। हिन्दू धर्म में प्रातः सवेरे विशेष रूप से सूर्योदय के समय सूर्यको जलाभिषेक कर नमन करने की मान्यता है। अर्थात सूर्य को भगवान के रूप में पूजा जाता है। वैज्ञानिकों के अनुसार अब तक की खोजों के अनुसार पृथ्वीवासियों के लिए एकमात्र असीम ऊर्जा का स्रोत है और यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि सूर्य के बिना पृथ्वी पर सृष्टि का अस्तित्व भी असम्भव है। इसका अंशतः अनुभव जब प्राप्त होता है जब कभी शरद ऋतु में बादलों के कारण पन्द्रह बीस दिन तक सूर्य की किरण पृथ्वी तक नहीं आ पाती। सभी जीव जन्तु मुरझा जाते हैं, पेड़ पौधे के पत्ते पीले पड़ जाते हैं और नर्सरी पौधे मरने लगते हैं। अतः सूर्य का अस्तित्व हमारे लिए महत्वपूर्ण है। सूर्योदय के समय सूर्य से प्राप्त किरणें मानव स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण हैं। उस समय हमारा शरीर विटामिन डी की आवश्यकताओं की पूर्ति भी कर सकता है। इसी लाभ को जनता तक पहुँचाने के लिए, सवेरे स्नानादि कर सूक्ष्म कपड़ों के साथ सूर्योदय को जलविसर्जन एवं सूर्य नमस्कार को योग को सूर्य पूजा के रूप में मान्यता दी गयी। चिकित्सा विज्ञान के न्यूनतम साधनों के समय मानव स्वास्थ्य को बनाये रखने का बेहतरीन तरीका खोजा गया जिसका लाभ आज भी कम नहीं हुआ है। यदि सम्भव हो तो सवेरे
शीघ्र उठकर प्रत्येक धर्म के अनुयायी को सूर्य के समक्ष अपनी उपस्थिति दर्ज करनी चाहिये।
जय भगवान: बाबा, मैं तो सुबह सात बजे के पश्चात ही उठ पाता हूँ तो फिर सूर्योदय के वक्त जल विसर्जन करना कैसे सम्भव हो सकता है।
फारूख: बाबा हम व्यापार के कार्यों से देर से मुक्त होते हैं और फिर दिन में विश्राम करने का भी समय नहीं मिल सकता। फिर सूर्योदय के समय उठकर सूर्य दर्शन चाहकर भी नहीं कर सकते।
बाबा बागड़ी: मुझे खुशी है, मेरी प्रत्येक चर्चा तुम्हें प्रभावित कर रही है। देखो, बेटा सारे सुख सबको उपलब्ध नहीं हो पाते, परन्तु उससे उस सुख का महत्व कम नहीं होता। तुम लोग प्रत्येक सोमवार को मेरे पास सवेरे आते हो, जाहिर है उस दिन शीघ्र उठते हो, अतः कम से कम उस दिन सूर्य दर्शन भी कर सकते हो। अतः जो सम्भव है, उसे तो कर ही सकते हो। अधिक नहीं थोड़ा लाभ तो होगा ही
दोनों दोस्त:आपका सुझाव पसन्द आया और आगे से सोमवार का दिन सूर्य दर्शन के लिए उचित रहेगा। उसके पश्चात दोनों मित्रों ने बाबा को प्रणाम कर विदा ली।

                              उपवासों की मान्यता
निश्चित कार्यक्रम के अनुसार अगले सोमवार सवेरे समय पर दोनों मित्रों ने बाबा के आश्रम में प्रवेश किया। बाबा के शिष्य ने उन्हें, प्रतीक्षा करने के लिए आंगन में पड़ी कुर्सियों पर बैठने का आग्रह किया। उनके नाम पूछकर बाबा को सूचित करने चला गया। लौटकर उसने बाबा द्वारा बुलाये जाने का संदेश दिया। दोनों दोस्त उठकर बाबा के पास पहुँचे।
बाबा बोले: यद्यपि मैं एक आवश्यक योजना बनाने में व्यस्त था परन्तु आप लोगों के पास समय सीमित होता है और फिर अपने कार्य के लिए व्यस्त होना पड़ता है। अतः अपने कार्य बाद में कर लूँगा। पहले आप लोगों को अपनी चर्चा का अंश सुनाकर फ्री कर दूँ।
दोनों मित्र: आपका व्यवहार सुनकर-देखकर हम लोग आपके अत्यन्त आभारी हैं। आपने हमारे लिए इतना सोचा यह कोई साधारण सोच नहीं हो सकती। यह हम पर आपके प्यार की वर्षा है।
बाबा बागड़ी: क्योंकि मैं एक हिन्दू परिवार मैं पैदा हुआ था, अतः हिन्दू मान्यताओं का अधिक अध्ययन करने का मौका मिला। यद्यपि उपवास प्रत्येक धर्म में प्रचलित है परन्तु उनके स्वरूप भिन्न-भिन्न हैं जैसे मुस्लिम धर्म में रोजे के रूप में उपवास किये जाते हैं। तो हिन्दू धर्म में व्रत के रूप में और ईसाई धर्म में फास्ट के रूप में जाने जाते हैं। प्राचीन काल में शिक्षा प्रचार के अभाव में समाज के नेता अर्थात धार्मिक नेता (उस समय धार्मिक नेता ही समाज का नेतृत्व भी संभालते थे) प्रत्येक लाभप्रद कार्य को धर्म से जोड़कर जनता के सामने रखते थे और जनता को अपरोक्ष रूप से स्वस्थ जीवन जीने के लिए प्रोत्साहित करते थे, जो स्वरूप आज भी जनता के दिलों में विराजमान है, अब देखते हैं उपवास, रोजे अथवा फास्ट से मानव स्वास्थ्य कैसे लाभ करता है। सभी उपवास पेट को नियन्त्रित करने के माध्यम हैं। हिन्दू धर्म में वैसे तो वर्ष भर त्यौहारों का प्रावधान चलता रहता है परन्तु नवरात्रि के व्रतों का महत्व कुछ अधिक ही बताया गया है। नवरात्रि वर्ष में दो बार अर्थात हर छः माह पश्चात आठ दिन लगातार व्रत रखे जाते हैं। जब भी नवरात्रि पर्व आते हैं हमारे देश में ऋतु परिवर्तन काल होता है और परिवर्तन काल में समस्त प्राणी पेट की समस्या अर्थात हाजमा खराब से जूझते हैं।
अतः उन दिनों लगातार एक समय भोजन कर पेट को विश्राम का अवसर देकर उसे ऋतु परिवर्तन के लिए तैयार कर लिया जाये तो पूरे वर्ष मानव प्राणी पेट की समस्याओं से बच सकता है। और पेट स्वस्थ रहने से स्वास्थ्य सम्बन्धी अधिकतर समस्याओं से बचा रहता है। अतः नवरात्रि व्रत पाचन क्रिया नियन्त्रित करने का अचूक नुस्खा है। इसी प्रकार रोजों में उपवास का अलग महत्व है। रोजे पूरे वर्ष में एक चक्रीय तिथियों में पीछे को हटते हुए चलते हैं। अर्थात् प्रति वर्ष रोजों का समय पूर्व से लगभग दस दिन पहले शुरू होता है। प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में हर मौसम में रोजे रखने का अनुभव करता है। रोजों के दिनों में पूरे दिन (सूर्यकाल) कुछ भी खाने पीने से अलग रहना होता है। पूरे रमजान माह में उन्हें भूख एवं प्यास को सहन करना होता है। अब रमजान का माह गर्मी में भी हो सकता है और बरसात और जाड़ों में भी। वस्तुतः पूरे माह रोजों से मनुष्य भूखे प्यासे रहने की सहनशक्ति विकसित करता है। साथ ही पेट को एक निश्चित अवधि तक नियन्त्रित विश्राम देकर स्वास्थ्य बनाने मंे सहयोग देता है और नई ऊर्जा के संचार होने से पूरे वर्ष हष्ट पुष्ट बना रहता है। यह एक आश्चर्य की बात है कि रोजे रखने से धार्मिक लाभ के साथ-साथ स्वास्थ्य लाभ भी मिलता है। मैंने अपने अनेक साथियों को रोजे न रखकर रोजों का बहाना करते देखा है। वे अपने धर्म से विमुख तो होते ही हैं, अपने स्वास्थ्य से भी अन्याय करते हैं। यह तो अब जानने को मिला।
जय भगवान:हमारे परिवार में लगभग सभी नवरात्रि के पहले दिन और आखिरी दिन व्रत रखते हैं ताकि देवी मां की पूजा भी हो जाये और अधिक दिन व्रत भी न रखना पड़े। परन्तु स्वास्थ्य की दृष्टि से तो पूरे आठ दिन ही व्रत रहना चाहिये।
बाबा बागड़ी: व्रत का अर्थ होता है सिर्फ एक समय सादा भोजन और फलाहार लिया जाये। यदि कोई व्यक्ति पकवान एवं व्यंजन का सेवन करता है तो वह स्वास्थ्य के लिए लाभकारी नहीं हो सकता। आज समय अभाव के कारण सिर्फ इतना ही काफी है और आज का कार्यक्रम समाप्त करते हैं।

 देवालयों में शंखनाद एवं घंटों की ध्वनि का महत्त्व  

अनेक धार्मिक स्थलों पर घंटे बजा कर अपनी उपस्थिति दर्ज करायी जाती है,शायद देवताओं अथवा इष्ट देव को प्रसन्न  की प्रथम  सीढ़ी मानी जाती है परन्तु बहुत कम लोग जानते हैं की घंटे बजने का एक वैज्ञानिक महत्त्व भी है ,विज्ञान के अनुसार यह क्रिया स्वास्थ्यकारी है 
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  जय भगवान:मुझे तो अपनी संस्कृति एवं पूजा पद्धति से लगाव होता जा रहा है। भगवान मिले न मिलें वे हमारी मनोकामना पूरी करें न करें हमारा स्वास्थ्य तो पूजा पद्धति ही सही कर देती है। धन्य है हमारी संस्कृति। धामिर्क स्थलों  पर घंटे बजाकर अपनी उपस्थित दर्ज करायी जाती है,  शायद देवताओं अथवा इष्टदेव को पस्रन्न करने की प्रथम सीढी़ मानी जाती है। परन्तु बहुत कम लोग जानते हैं कि घन्टे बजाने का वैज्ञानिक  आधार पर अलग महत्व है जो स्वास्थ्यकारी है 
जय भगवान:बाबा आप फरमा रहे हैं, भला घंटे बजने से स्वास्थ्य का क्या सरोकार। यह तो बिल्कुल आश्चयजनक बात आप बता रहे हैं।
फारूख: क्या हम जान सकते हैं इनका वैज्ञानिक महत्व क्या है?
बाबा बागड़ी: अवश्य बताऊँगा, यह बताने के लिए ही तो इस विषय को छेड़ा है। दरअसल घंटों की ध्वनि तरंगे बैक्टीरिया का नाश करती हैं और मन्दिर का वातावरण शुद्ध करने में सहायक होती हैं।
जय भगवान: बाबा जी, मन्दिर में तो पुजारी जन काफी साफ सफाई रखते हैं फिर बीमारी के बैक्टीरिया कहाँ से आ जाते हैं। हमारे पुजारी जी तो भगवान की मूर्तियों की बहुत साफ-सफाई करते रहते हैं। उनके वस्त्रों को भी बदलकर शुद्ध करते रहते हैं।
बाबा बागड़ी:जय भगवान बेटा तुम बिल्कुल ठीक कह रहे हो। परन्तु बेटा मन्दिर एक सार्वजनिक स्थान है जहाँ प्रत्येक वर्ग अर्थात गरीब, अमीर, रोगी-निरोगी के लिएद्वार खुले हैं अतः निरन्तर शंखनाद एवं घंटों की ध्वनि करते रहने से बैक्टीरिया खत्म होते रहते हैं और हवा शुद्ध-रोग रहित बनी रहती है। विशेष तौर पर किसी पर्व पर मन्दिर में अधिक भीड़ होने पर उपस्थित भक्तों को संक्रामकता से बचाव होता है।यह सही है?
जय भगवान: बाबा जी, हवन को भी तो वायु शुद्धि का कारण माना जाता है क्या ?
बाबा बागड़ी: यह बात सही है कि हवन में प्रयुक्त हवन-सामग्री घी, कपूर, धूप बत्ती आदि अग्नि में प्रज्वलित होकर वायु में ऑक्सीजन की वृद्धि करते हैं और वायु को कीटाणु रहित करते हैं। अक्सर तुमने देखा होगा जिस देवालय में नियमित हवन होते रहते हैं वहाँ पहुंचकर मन एक अजीब सी शान्ति अनुभव करता है और मन प्रफुल्लित होता है, वह वहाँ के शुद्ध वातावरण का कमाल होता है।

गायत्री मन्त्र का महत्व

बाबा बागड़ी: अब मैं एक विषय पर और प्रकाश  डालकर अपनी वाणी को विराम दूंगा हिन्दू धर्म में गायत्री मन्त्र का जाप सभी मन्त्रों के मुकाबले अधिक महत्वपूर्ण माना गया है। सभी ऋषि मुनियों ने गायत्री का जाप प्रत्येक पूजा में आवश्यक माना है। इसके जाप का महत्व जानने के लिए बह्म्रबर्चस्व शान्तिकुञ्ज हरिद्वार ने शोध  किया, तो पाया सभी मन्त्रों के उच्चारण के मुकाबले  गायत्री मन्त्र का जाप अर्थात  उसके जाप से उत्पन्न ध्वनि तरंगों  का प्रभाव  मानव शरीर एवं मन पर सर्वाधिक  पाया गया।
गायत्री मत्रं के निरतंर उच्चारण से न सिर्फ मानव शरीर में  ऊर्जा का संचार होता हैउसका शरीर स्वस्थ रहता हैबल्कि  जाप स्थल के वातावरण में भी स्वच्छता आरै सकारात्मकता आती है  जो आने वाले मेहमानों  को सुखद अनुभूति का अहसास कराती है।
जय भगवान:मुझे तो अपनी संस्कृति एवं पूजा पद्धति से लगाव होता जा रहा है। भगवान मिले न मिलें वे हमारी मनोकामना पूरी करें न करें हमारा स्वास्थ्य तो पूजा पद्धति ही सही कर देती है। धन्य है हमारी संस्कृति। 
बाबा बागड़ी:सभी धर्मों में इस प्रकार के लाभ मौजूद हैं, आवश्यकता है इनका अध्ययन करने की और तर्क ढूंढने की। यदि इन लाभों की जानकारी प्राप्त हो तो पूजा का महत्व और भी बढ़ जाता है।

       ईष्ट देव में विश्वास एवं पूजा-अर्चना का महत्व

        आज हम चर्चा करेंगे आस्था एवं पूजा से लाभ की। सभी धर्मों के अपने-अपने इष्ट देव होते हैं, उनके नाम पृथक-पृथक हैं, उनके अस्तित्व का स्वरूप भिन्न-भिन्न है। कहीं पर राम, शिव, विष्णु इष्ट देव के रूप में जाने जाते हैं तो कहीं गुरु, अल्लाह गौड के रूप में मान्य हैं। कहीं पर इष्ट देव को आकार (मूर्ति) देकर पूजा जाता है तो कहीं निराकार रूप में स्तुति की जाती है। आस्था किसी भी रूप में हो परन्तु आस्था के अपने लाभ हैं और यह आस्था मानव को इसी प्रकार संरक्षण प्रदान करती है जैसे घर में बुजुर्ग व्यक्ति घर की पूरी जिम्मेदारी संभालता है तो शेष परिजन बेफिक्र हो जाते हैं। उनकी उपस्थिति परिजनों का हौसला बनाये रखती है, उन्हें उत्साहित एवं ऊर्जावान बनाये रखती है। कभी-कभी बुजुर्गों का योगदान परिवारिक कार्यों में न के बराबर होता है, फिर भी सभी परिजनों को संतोष रहता है। इसी प्रकार किसी भी इष्ट देव में विश्वास, मानव को मानसिक कवच का काम करता है। प्रत्येक इंसान को अपने जीवन में अनेकों बार कष्टदायी या उलझन भरे क्षणों से गुजरना पड़ता है। ऐसे नाजुक पलों में उसका विश्वास ही उसका मनोबल बनाये रखता है। वह अपने मन को संतुलित एवं शांत रख पाता है। कहीं भी अनिर्णय की स्थिति में अपने इष्ट देव की मर्जी पर छोड़कर तनाव मुक्त हो जाता है, और तनाव जनित रोगों से अपने स्वास्थ्य की रक्षा कर पाता है।यद्यपि कभी कभी अपने इष्ट देव में कट्टर विश्वास के कारण दूसरे उपास्य देव के आस्थावानों के प्रति असहनशील हो जाता है। जो धार्मिक उन्माद का रूप लेकर हिंसा को जन्म देता है। कालान्तर में धार्मिक दंगों का रूप लेकर सामाजिक विकृतियां उत्पन्न कर देता है। प्रत्येक व्यक्ति की आस्था अलग-अलग होती है। किसी व्यक्ति को अपनी आस्था किसी पर थोपने का अधिकार नहीं दिया जा सकता। आस्था सिर्फ मानसिक शांति एवं सामाजिक व्यवस्था का कारक है और प्रत्येक धर्म की आस्था का मूल उद्देश्य यही है। उपास्य देव में विश्वास के साथ पूजा अर्चना का विधान बनाया गया है। पूजा,इबादत, प्रेयर देवालयों में भी हो सकती है और घर इत्यादि में भी हो सकती है। वैज्ञानिक रूप से पूजा अर्चना का मूल उद्देश्य मन को केन्द्रित करना है, उसे एकाग्रचित करना है जिससे मानसिक विकारों से मुक्ति मिलती है। शरीर में ऊर्जा का संचार होता है। पूजा अर्चना इंसान की दिनचर्या को नियमित करने का साधन भी है जिससे मानव स्वास्थ्य स्थिर बना रहता है। पूजा अर्चना विशेष कर सामूहिक आयोजनों द्वारा समाज में आपसी भाई-चारा, सहयोग और सम्मान को बढ़ावा मिलता है। अतः सामाजिक स्वास्थ्य भी ठीक रहता है और अपराधों पर अंकुश लगता है।
जय भगवान:बाबा जी आपने पूजा एवं आस्था के इतने लाभ बता दिये। क्या पूजा अर्चना कर रहे आस्थावानों को इन लाभों की जानकारी होती है अथवा अपरोक्ष लाभ लेते रहते हैं।
फारूख: इतनी गहराई से जानने की कोशिश तो शायद ही कोई करता होगा।
बाबा बागड़ी:सही बात यही है आस्था अथवा श्रद्धा तर्क के सहारे नहीं चलती। अतः सभी लाभ भी अपरोक्ष रूप से इंसान उठा लेता है जिन्हें वह अपने इष्ट देव के आशीर्वाद के रूप में समझकर और अधिक दृढ़ आस्थावान हो जाता है।
जय भगवान:प्राचीन काल में हजारों वर्ष पूर्व भी कुछ लोग इतने विद्वान रहे हैं जानकर हैरानी होती है। उन्होंने अपनी विद्वता का उपयोग समाज के कल्याण, उसके सुख चैन, उसकी व्यवस्था के लिए किया, यह तो और भी प्रशंसनीय है। हम वास्तव में उनके ऋणी हैं जो उन्होंने हमारे समाज (मानव समाज) को विकसित करने का मार्ग प्रशस्त किया.
जय भगवान की बातें सुनकर बाबा बागड़ी गद्गगद् हो गये। उन्होंने जय भगवान के सटीक विश्लेषण की सराहना की।
  
त्यौहारों का धर्मों से सम्बन्ध
बाबा ने आगे का विषय लेते हुए त्यौहारों, उत्सवों का धर्मों से सम्बन्ध पर चर्चा की। इसके मनोवैज्ञानिक कारण ढूंढे।
बाबा बागड़ी:हर धर्म में कुछ पर्व मनाये जाते हैं, जैसे हिन्दू धर्म में मुख्य रूप से दिवाली, होली, रक्षाबन्धन आदि। मुस्लिम धर्म में ईद-उल-फितर, ईद-उल-जुआ, ईसाई धर्म में मुख्य त्यौहार क्रिसमस, सिख धर्म में गुरु पूरब, लोहड़ी, बैसाखी इत्यादि के अतिरिक्त कुछ क्षेत्रीय त्यौहार भी मनाये जाते हैं जैसे महाराष्ट्र गणेश चतुर्थी, बंगाल में दुर्गा पूजा, केरल में ओणम, तमिलनाडू में पांेगल, असम में बीहू आदि त्यौहारों की लम्बी लिस्ट हैं.
तात्पर्य यह है अलग-अलग देशों में विद्यमान अलग-अलग धर्म एवं मान्यताओं के अनुसार त्यौहार मनाये जाते हैं। धर्मों के उद्भव काल में इंसान के मनोरंजन के साधन सीमित होते थे। अतःधर्माधिकारियों ने इंसान को कार्य निरंतरता और कार्य की एकरूपता की ऊब से मुक्ति दिलाकर प्रसन्नता के क्षण उपलब्ध कराये ताकि मानव अपने समाज में सामूहिक से परिजनों और मित्रगणों के साथ कुछ समय सुखद पलों के रूप में बिता सके। त्यौहारों, उत्सवों के रूप में, मानव गतिविधि को एक तरफ तो अपने इष्टदेव की ओर आकृष्ट किया (पूजा-अर्चना-नमाज आदि) तो दूसरी ओर अनेक पकवानों का प्रावधान कर, मेल-जोल की परम्परा देकर मानव जीवन में उत्साह का संचार किया। जिससे उसमें फिर से कार्य करने की क्षमता वृद्धि की और मानसिक प्रसन्नता से जीने की लालसा बढ़ी। अनेक धार्मिक मेलों का आयोजन कर बच्चों, बड़ों का विभिन्न क्रियाकलापों द्वारा मनोरंजन किया। पहले त्यौहार आने की खुशी मानव को सुखद अनुभूति कराती है तो बाद में त्यौहारों से जुड़ी यादें उसे कार्य समय के दौरान भी उत्साहित करती रहती हैं। साथ ही अपने इष्ट देव से सम्बद्ध होने का अवसर मिलता है। आज के वातावरण में (उन्नतिशील समाज) जब अनेकों मनोरंजन के साधन विकसित हो चुके हैं, नये नये खान-पान मानव जीवन में जुड़ गये हैं। उनकी हर समय सुलभता बढ़ गयी है। सामूहिक भावना का अभाव हो गया है, मनुष्य आत्म केन्द्रित होता जा रहा है। त्यौहारों का महत्व अप्रासंगिक होता जा रहा है। वर्तमान में त्यौहारों में उत्साह में हो रही कमी इस बात का प्रमाण है। आज त्यौहारों का मुख्य उद्देश्य गौड़ हो गया है। इसके साथ ही बाबा ने चर्चा समाप्त की।

नमाज पढ़ने की क्रियाएँ स्वास्थ्यप्रद
बाबा बागड़ी: मुस्लिम धर्म में  नमाज की आयतें पढने का कार्य विभिन्न क्रियाओं द्वारा सम्पन्न किया जाता है। नमाज पढते  वक्त इबादतकार घुटनों  के बल बैठकर दोनों  हाथ फैलाकर अल्लाह से दुआएं मागंता है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से पाया गया हैघुटनों  के बल बैठने की क्रिया योग में  बताये गये वज्रासन की भांति है,
जो कि पाचन क्रिया में  सहायक होता है। पाचन क्रिया ठीक रहने से व्यक्ति स्वास्थ्य लाभ करता है। इस प्रकार हमारे पूर्वजों ने चमत्कारिक ढंग से धर्मों के माध्यम से शारीरिक और मानसिक लाभ सुलभ कराया।
जय भगवान: जय भगवान: हमारे धर्म में पाचन क्रिया सुधारने के लिए कोई प्रावधान नहीं किया गया।
बाबा बागड़ी:तुम्हारी यह बात मान्य नहीं है। हिन्दू धर्म में योग का वर्णन प्राचीन ग्रंथों में विद्यमान है जिसमें वज्रासन ही वह क्रिया है। योग द्वारा स्वास्थ्य की प्राप्ति आज बहुत प्रासंगिक हो चुकी है। बाबा राम देव ने जनता में इसका प्रचार प्रसार कर लोकप्रिय बना दिया और पूरे विश्व को रोग रहित बनाने का बीड़ा उठाया है।
फारूख:अब मैं नमाज पढ़ते वक्त सिर्फ धार्मिक नहीं स्वास्थ्य लाभ की दृष्टि भी रखूँगा। और शरीर के लिए एक आवश्यक क्रिया मानकर नियमित रहने का प्रयास करूँगा।
गाय को माता के रूप में मान्यता
बाबा बागड़ी:जय भगवान, क्या तुम्हें गाय के महत्व की जानकारी है, गाय से प्राप्त दूध, गोबर व मूत्र के उपयोग अथवा लाभ जानते हो?
जय भगवान:बाबा जी, गाय का दूध अन्य पशुओं के दूध के मुकाबले अधिक स्वास्थ्यप्रद माना जाता है। उसे पीने से रोगों से लड़ने की क्षमता विकसित होती है। इसीलिए बच्चों के लिए गाय का दूध वरदान है। गाय का गोबर व मूत्र अनेक दवाओं में उपयोग होता है। गोबर को पवित्र एवं एण्टी-बायोटिक माना जाता है। इसीलिए प्राचीन काल में घरों को लीपने में काम आता था और ईंधन के रूप में इसक कंडे बनाकर प्रयोग होता था।
बाबा बागड़ी:गाय से प्राप्त उत्पादों की गुणवत्ता को देखते हुए हिन्दू धर्म में गाय को माता के रूप में माना गया। गाय को अति सम्मान देकर प्रत्येक हिन्दू का कर्त्तव्य बताया गया कि वह गौसेवा और गौरक्षा करे। जैसा कि जय भगवान ने बताया गाय की उपयोगिता देखते हुए, गौवंश की रक्षा और उसके महत्व को जनता तक प्रसारित करने के लिए गाय को पूजनीय करार दिया गा। कष्टों के समय गौ-दान कष्ट निवारक एवं पुण्य का कार्य बताया गया। ताकि गौ वंश की रक्षा हो और मानव स्वास्थ्य बना रहे। विज्ञान के द्वारा प्राप्त शोधों से पाया गया है कि गाय का दूध मां के दूध के पश्चात सर्वाधिक लाभदायक है। आयुर्वेद की अनेक दवाओं का सेवन गाय के दूध के साथ श्रेष्ठकर होता है। इसी प्रकार गौमूत्र एवं गोबर से अनेक आयुर्वेदिक दवाएं तैयार की जाती हैं। गाय के दूध से प्राप्त घी की गुणवत्ता सर्वाधिक होती है। अतः पूर्वजों ने गाय की पूजा और उसके दान का संदेश देकर मानव जाति को स्वस्थ रहने का पैगाम दे दिया। गौवध और गौमांस उपभोग को निषेध बताया गया ताकि गाय के उत्पादों की उपलब्धता बनी रहे। फारूख क्या गाय की रक्षा करना सिर्फ हिन्दूओं के लिए उचित होगा?
फारूख:जो गाय मानव मात्र के लिए उपयोगी है तो उसकी रक्षा भी प्रत्येक मानव को करनी चाहिये। मानव तो मानव होता है, हिन्दू-मुस्लिम बाद में। मानवहित में सोचना प्रत्येक व्यक्ति का कर्त्तव्य है। उसी में सब का लाभ है। आज का विषय अब समाप्त करते हैं। अगले सोमवार फिर एक नया टौपिक विचारणीय होगा।

हवन का महत्व

आज रविवार के दिन फारूख और जय भगवान अपने शोरूम में बैठे बाबा बागड़ी के बारे में बातें कर रहे थे जिसमें उनके द्वारा बताये गये नमाज के लाभ एवं गाय को माता के रूप में पूजने के कारण शामिल थे। अपने स्टाफ के साथ अपने विचार रख रहे थे। उनके स्टाफ के सदस्य बाबा द्वारा दिये जा रहे ज्ञान का लाभ ले रहे थे। वे लगभग चौंक गये थे कि नमाज से स्वास्थ्य लाभ भी होता है। नसीम बोला बाबा महान हैं, मैं चाहता हूं मैं भी बाबा के दर्शन करू और उनसे रू-ब-रू होकर बातें करूँ। क्या आप मुझे भी कल अपने साथ ले चलेंगे?
फारूख:पहले बाबा से पूछना होगा तब ही उनसे मुलाकात हो सकती है। हम कल बाबा से आज्ञा मागेंगे फिर अगले सोमवार को मिलना सम्भव हो सकता है।
नसीम:सर, कृपया कल आप पूछियेगा अवश्य। मैं अपने को धन्य मानूँगा। अगले दिन दोनों दोस्त एक नई जानकारी पाने की हसरत लिए बाबा के दरबार पहुंचे।
बाबा:आज हम लोग हवन के लाभ जानेंगे। हवन हिन्दू धर्म का प्रमुख आयोजन है जो सामूहिक रूप से सभी भक्त मिलकर करते हैं।
इस आयोजन में मन्त्रोच्चार के पश्चात हवन कुण्ड में विभिन्न जड़ी-बूटियों एवं घृत से तैयार हवन सामग्री को प्रज्जवलित किया जाता है। उसके साथ-साथ देशी घी की आहूति भी दी जाती है। मन्त्रोच्चारण के लाभ के अतिरिक्त हवन सामग्री एवं घी की आहूति से प्राप्त वायु एवं ऊष्मा हवन कुण्ड के चारों ओर विद्यमान भक्तों को स्वास्थ्य लाभ पहुंचाती है। उन्हें अतिरिक्त ऑक्सीजन मिलती है, साथ ही वायुमण्डल को शुद्ध एवं कीटाणु मुक्त करने में मदद मिलती है। यही कारण है कि देवालयों और सन्तों के आश्रम का वातावरण खुशगवार मिलता है। वहाँ पहुंचने वाला आगन्तुक शान्ति का अहसास करता है और सन्तों एवं आश्रम निवासियों के चेहरे पर तेज दिखाई देता है। उनके चेहरे पर लाली उनके खानपान के कारण नहीं होती बल्कि उनके संयमित जीवन, योग क्रियाएँ, नियमित हवन-यज्ञ के कारण आती है। वे प्रकृति के अधिक करीब होकर अपने जीवन को तनाव मुक्त होकर जीते हैं। स्पष्ट है हवन सिर्फ धार्मिक आयोजन ही नहीं बल्कि स्वस्थ रहने का अचूक साधन भी है। इस विषय के साथ ही हमारी विचार श्रृंखला का द्वितीय अध्याय समाप्त हुआ।

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रविवार, 21 जुलाई 2013

{ पुस्तक का परिचय एवं प्रथम अध्याय }


{पुस्तक}
बागड़ी बाबा
और
इंसानियत
का धर्म


लेखक-----सत्यशील अग्रवाल

प्रथम संस्करण 2010



(सर्वाधिकार लेखक के पास सुरक्षित हैं)

 मेरठ।

लेखक की कलम से

     आम मानव जीवन किसी न किसी धर्म द्वारा संचालित रहा है। उसके द्वारा नियंत्रित रहा है। बदलते जीवन मूल्यों, जीवन शैली ने इंसान को परम्परागत चले आ रहे रीति-रिवाज, मान्यता, विश्वास को नये सिरे से वर्तमान संदर्भ में सोचने को मजबूर कर दिया है जिस कारण एक असाधारण बदलाव की लहर भी चल पड़ी है। इसी परिवर्तन की लहर को तर्क की कसौटी पर कसने का प्रयास इस पुस्तक में किया गया है। यह विश्लेषण किसी धर्म की अवमानना के उद्देश्य से नहीं किया गया है। लेखक के लिए सभी धर्म सम्माननीय हैं।
आस्था और तर्क का कोई सम्बन्ध नहीं होता। धार्मिक आस्था सिर्फ एक विश्वास है और विश्वास किसी तर्क द्वारा परिभाषित नहीं होता। परन्तु यह भी सत्य है प्रत्येक धर्म का मूल उद्देश्य समाज का कल्याण रहा है ताकि मानव को इंसानियत के दायरे में रखकर समाज को मानव जीवन के अनुकूल बनाया जा सके। परन्तु जब
यही विश्वास अन्धविश्वास का रूप लेकर मानवता का तिरस्कार करने लगे, इंसान को इंसान के प्रति हिंसा के लिए प्रेरित करने लगे, इंसान के मौलिक अधिकारों पर कुठाराघात करने लगे तो यह विश्वास ही अभिशाप बन जाता है। धर्म अपने मूल उद्देश्य से भटक जाता है। लेखक के विचार से इंसानियत का धर्म सभी धर्मों का मूल उद्देश्य है। सभी धर्मों का सार है, आज के वैश्वीकृत युग की आवश्यकता है एवं पूरे विश्व में मान्य हैं अतः धार्मिक विश्वास से भी अधिक महत्वपूर्ण है, इंसानियत के धर्म का पालन किया जाये।
प्रस्तुत पुस्तक के सभी पात्र काल्पनिक हैं। किसी के नाम से मेल खाना सिर्फ संयोग ही माना जाना चाहिये। पाठकों की प्रतिक्रियाएँ सदैव स्वागत योग्य हैं।
-सत्यशील अग्रवाल
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क्या है धर्म ?
           धर्म का मूल अर्थ है धारण करना, अर्थात जो कुछ हम खाते-पीते हैं, पहनते हैं, रहते हैं, समाज से, परिवार से व्यवहार करते हैं, देश के लिए विचार रखते हैं, सब कुछ धर्म है। मानव सृष्टि के आरम्भ में जब मानव ने विकास करना शुरू किया, सोचना-समझना शुरू किया, मानव को समाज के रूप में रहने का ज्ञान मिला, समाज को व्यवस्थित करने की महती आवश्यकता थी। शिक्षा के प्रचार के अभाव में, प्रसार माध्यमों के अभाव में, जनता तक संदेश पहुंचाने का माध्यम अध्यात्म को चुना गया जो विभिन्न धर्मों के नाम से जाने गये। जहाँ कुछ अच्छाईयाँ होती हैं वहाँ कुछ बुराइयाँ भी जन्म ले लेती हैं। इसी प्रकार विभिन्न धर्मों ने जहाँ समाज को व्यवस्था, शान्ति, भाई-चारा प्रदान किया, धार्मिक कट्टरता ने आतंकवाद के रूप में श्राप भी दिया जिसका दंश आज पूरा विश्व झेल रहा है।
        अब समय आ गया है या तो विश्व में धार्मिक कट्टरपन रहेगा अथवा मानव विकास। धार्मिक कट्टरता मानव विकास को पाषाण युग की ओर धकेल देगी।अतः धार्मिक कट्टरता को समाप्त होना ही होगा, यह अनिश्चित है। शिक्षा के बढ़ते प्रभाव और विकास से उत्पन्न सम्पन्नता धार्मिकता और ईश्वरीय सत्ता का अन्त कर देगी। रह जायेगा सिर्फ इंसानियत का धर्मअर्थात् सहिष्णुता, विशालता, शालीनता, सभ्यता द्वारा संसार संचालित होगा। धार्मिक आस्था एक अतीत का विषय रह जायेगी।

-लेखक

आभार अभिव्यक्ति
            विज्ञान एवं इंजीनियरिंग का छात्रा होने के बावजूद लेखों के माध्यम से विचारों का संग्रह करना मेरा शौक रहा है। व्यापारिक गविविधियों एवं परिवारिक जिम्मेदारियों से मुक्त होकर अपने लेखों के संग्रह को प्रकाशित करने की बीड़ा उठाया है। पिछले पाँच वर्षों से जनता के सामने छोटे-छोटे लेखों द्वारा विचार व्यक्त करता रहा हूँ। इस पुस्तक के रूप में साहित्य की रचना मेरा पहला प्रयास है।
                  मेरा जीवन अनेक विसंगतियों एवं विषमताओं से भरपूर रहा है जिसमें मैंने मानसिक, शारीरिक, आर्थिक कष्टों को निर्वाध होकर जिया है। इस दुर्गम जीवन संघर्ष और परिस्थितियों की तीक्षणता से उबरने में सर्वाधिक योगदान मेरे सुपुत्रा अनुज अग्रवाल का रहा है। इस पुस्तक के लिए सहयोग एवं प्रेरणा का मुख्य स्रोत होने के कारण सर्वाधिक श्रेय का पात्रा भी वही है।
               यद्यपि मेरा सम्पूर्ण परिवार इस पुस्तक की रचना के लिए प्रेरणास्रोत बना है सभी परिजनों ने मेरा मार्गदर्शन एवं उत्साहवर्धन किया है, परन्तु मेरी सुपुत्राी भावना अग्रवाल, प्रिय भाई श्री सत्यप्रकाश गर्ग एवं मेरी धर्मपत्नी श्रीमती ऊषा अग्रवाल का सहयोग एवं उनकी प्रेरणा विशेष रूप से उल्लेखनीय है।
               आर.आर. एडवरटाइजिंग के संचालक श्री राकेश कुमार गुप्ता जी, जो मेरे साहित्य गुरू भी हैं, ने अपना अमूल्य सहयोग एवं मार्गदर्शन देकर इस पुस्तक का मुद्रण एवं प्रकाशन सम्भव कराया। उनका मैं आजीवन आभारी रहूँगा।
              प्रस्तुत पुस्तक में पाठकों के समक्ष विभिन्न धर्मों में व्याप्त रुढ़ियों, मान्यताओं का तार्किक विश्लेषण पेश किया है और वर्तमान भौतिकवादी एवं वैश्वीकृत युग में फ्इंसानियत के धर्मय् की महत्ता को प्रस्तुत किया है। मैं अपने उद्देश्य में कितना सपफल रहा हूँ यह तो पाठकगण ही तय करेंगे। यह तो सत्य है कि तर्क के द्वारा विचार अभिव्यक्ति समाज में आवश्यकतानुसार परिवर्तन एवं सुधार लाने की सामर्थ्य रखती है।
-लेखक

      परिचय (प्रमुख पात्र )

 [“प्रस्तुत पुस्तक का मुख्य पात्र बागड़ी बाबा’   एक ऐसे व्यक्तित्व का नाम है जो इंसानियत की प्रतिमूर्ति है। बागड़ी बाबाअपने विद्यार्थी जीवन में अलौकिक प्रतिभा का छात्र रहा है, साथ ही परिवार की पुश्तैनी अपार सम्पदा का मालिक भी। परन्तु सारे सुख वैभव अथवा विलासितापूर्ण जीवन के स्थान पर समाज सेवा एवं सादा जीवन अपनाने का संकल्प लिया। समस्त जायदाद को आश्रमों में स्थानान्तरित कर दीन दुखियों को समर्पित कर दिया।”]
         जय भगवन और फारूख बचपन से ही दोस्त रहे हैं।उनकी स्कूली शिक्षा से लेकर स्नातक की शिक्षा साथ-साथ हुई। उन्होंने आगरा विश्विद्यालय से विज्ञान में स्नातक की डिग्री प्राप्त की। क्योंकि दोनों दोस्त मध्यम दर्जे के विद्यार्थी रहे थे। उच्च योग्यता पाने के लिए प्रयास नहीं किये और अपने भावी जीवन में व्यापार करने की योजना बनायी। दोनों में आपसी विश्वास, ईमानदारी, वफादारी कूट-कूट कर भरी हुई थी। अतः दोनों ने एक साथ ही इलैक्ट्रोनिक्स एलायंस जैसे टी.वी., ओडियो, वीडियो सिस्टम, वाशिंग मशीन इत्यादि का शोरूम खोलने का निर्णय लिया। टैक्निकल कार्य शुरू करने से पहले उसके बारे में ज्ञान एवं अनुभव की आवश्यकता होती है।
             इसीलिए व्यापार प्रारम्भ करने से पहले एक वर्ष का टी.वी. कोर्स स्थानीय प्राइवेट संस्था से करने का निश्चय किया। साथ ही शोरूम के लिए स्थान एवं अन्य औपचारिकताओं के लिए प्रयास भी प्रारम्भ कर दिये। शीघ्र ही शहर के विकसित क्षेत्र में दुकान पाने में सफल हो गये। दुकान किराये पर मिल गयी। दुकान में आवश्यक रिपेयर वर्क और रंगाई-पुताई आदि कार्य प्रारम्भ कर दिये ताकि प्रशिक्षण कार्यक्रम पूरा होते ही व्यापार शुरू किया जा सके। अतः पढ़ाई के साथ-साथ दुकान को तैयार करने का कार्यक्रम भी चलता रहा। प्रशिक्षण का वर्ष पूरा होते ही फर्नीचर बनवाना शुरू कर दिया और वह दिन भी आ गया जब दुकान एक शोरूम के रूप में परिवर्तित हो चुकी थी। दुकान का मुहुर्त किया गया। दोनों दोस्तों की तन्मयता, ईमानदारी और सद्व्यवहार ने व्यापार को लोकप्रिय बना दिया। पूरे शहर में उनकी चर्चा आम हो गयी थी। चर्चा थी उनके छल-कपट रहित एवं धोखाधड़ी विहीन व्यवहार की, उनकी ईमानदारी की एवं तर्कसंगत कीमतों की। दोनों दोस्तों का उद्देश्य अपनी आर्थिक आवश्यकताओं की पूर्ति के साथ-साथ समाज सेवा भी था।  एक दिन जय भगवान कुछ फुर्सत के क्षणों में फारूख से बोला हमारे पड़ोसी डा. ए.के. एन्टनी (एम.डी.) के घर बाबा बागड़ी रूके हुए हैं और शायद कल शाम तक वे अपने आश्रम के लिए प्रस्थान कर जायेंगे
फारूख बोला: मुझे बाबाओं से क्या लेना देना, आये हैं तो आएँ, जाना है तो जाएँ, अगर उन्हें टी.वी. आदि लेना हो तो बात करें।
जय भगवान बोला: बागड़ी बाबा वैसे बाबा नहीं हैं जैसा तुम सोच रहे हो। वे वास्तव में इंसानियत के पुजारी हैं, उन्होंने अपना जीवन जनता के कल्याण के लिए समर्पित किया हुआ है।
फारूख: क्या ऐसे बाबा भी होते हैं?
जय भगवान: जब तुम उनसे मिलोगे और उनके बारे में जानकारी प्राप्त करोगे तो उनके कायल हुए बिना नहीं रह सकते।
फारूख: ऐसा क्या है बाबा बागड़ी में?
 जय भगवान: बाबा ऐसे समाज सेवक हैं जो समाज में बहुत कम देखने को मिलते हैं। मैं तुम्हें उनके बारे में संक्षिप्त रूप से बताता हूँ। बाबा अपने विद्यार्थी जीवन में मेधावी छात्र रहे हैं। परन्तु वे गांधीवाद से काफी प्रभावित थे। अतः स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त कर समाज सेवा करने का संकल्प लिया। उनके पूर्वज गांव के बड़े जमींदार थे, उकने पास अपार सम्पत्ति थी। बाबा सादा जीवन उच्च विचार में विश्वास करते हैं। अतः उन्होंने अपनी पैत्रिक जायदाद को बेचकर अनेक शहरों में सेवालय खोल दिये, जो पूर्णतः गरीबों, असमर्थों, वृद्धों, महिलाओं की सेवा में कार्य कर रहे हैं। उन सेवालयों में बीमार व्यक्तियों के लिए चिकित्सा सुविधा मुफ्त उपलब्ध है, वृद्धों के लिए वृद्धाश्रम है एवं गरीब युवक युवतियों के लिए निःशुल्क विवाह स्थल के रूप में समर्पित हैं। बच्चों की शिक्षा के लिए असमर्थ विद्यार्थियों को बाबा की ओर से सहयोग दिया जाता है। शहर के गणमान्य उद्योगपति व्यापारी बाबा के कार्य में अपना योगदान देते हैं। बाबा के स्वयं के खर्चे नगण्य हैं। शौक के रूप में मानव पीड़ा का हरण करना, उनके जीवन का उद्देश्य बना हुआ है। उनके इस पुनीत कार्य में उनके अनेक अनुयायी उनके साथ जुड़े हुए हें, जो आश्रम के कार्यों में उनका सहयोग करते हैं। अब उनके इस कार्य ने शहर में अभियान का रूप ले लिया है। वे किसी धर्म के प्रचारक नहीं हैं। मानव सेवा और इंसानियत ही उनका धर्म है। वे प्रत्येक धर्म का सम्मान करते हैं। उनका कथन है हम नहीं पूछते तेरा धर्म क्या है? हम पूछते हैं, तेरा दुःख दर्द क्या है?“ उनके अनुयायी अपनी क्षमता और योग्यता के अनुसार तन-मन-धन से उनके इस सद्कार्य में अपना योगदान करते हैं। डा0 एन्टोनी भी अपना दो घंटे का समय आश्रम के चिकित्सालय में आये रोगियों को निःशुल्क परामर्श में देते हैं।
फारूख: जय भगवान क्या मैं भी ऐसे पैगम्बर रूपी बाबा से मिल सकता हूँ।
जय भगवान: जैसा तुम्हें याद होगा डा0 एन्टोनी इंटर तक हमारे साथ ही पढ़ा करते थे। हम लोग बचपन में साथ-साथ खेला करते थे।
फारूख: हाँ याद आया जिसे हम किताबी कीड़ा कहकर चिढ़ाया करते थे।  
जय भगवान: हाँ, वही किताबी कीड़ा आज अपने शहर का नामी-गिरामी डॉक्टर बन चुका है। गांधीनगर में उसने शानदार कोठी बनाई है। हम लोग डॉक्टर के सहयोग से बाबा से मुलाकात कर सकते हैं। क्योंकि डॉक्टर बाबा के पक्के अनुयायी और सहयोगी हैं, उनके द्वारा परिचय कराने से बाबा हमारी जिज्ञासाओं का शान्तिपूर्वक उत्तर देंगे।
फारूख: यह तो एक स्वर्ण अवसर होगा और हमें कुछ सीखने को मिल पायेगा। शायद उनके सहारे हमारा जीवन भी सफल हो जाये।
दोनों मित्रों की सहमति हो जाने पर जय भगवान ने डॉक्टर एन्टोनी से सम्पर्क कर बाबा से अगले दिन प्रातः छः बजे का समय नियत कर लिया। सवेरे जब मित्रगण डॉक्टर के निवास पर पहुँचे, डॉक्टर साहब किसी अस्पताल में विजिट करने के लिए तैयार हो रहे थे। उन्होंने दोनों मित्रों का हार्दिक स्वागत किया। उन्होंने बाबा का अहसान जताया जिनके कारण उन्हें उनके पुराने सहपाठियों से मुलाकात का अवसर मिला। डॉक्टर साहब उनकी बाबा से मुलाकात करने की इच्छा से बहुत प्रभावित थे।
डॉक्टर एन्टोनी: बाबा अभी योग क्रिया में लीन हैं, अतः कुछ समय प्रतीक्षा करनी होगी। जब तक हम लोग गपशप करते हैं। डॉक्टर साहब ने अपने घरेलू नौकर से चाय नाश्ते का बंदोबस्त करने का आदेश दिया।
जय भगवान: अरे एन्टोनी आप तो कहीं जाने के लिए तैयार हो रहे थे। हम लोग आपका समय व्यर्थ कर रहे हैं।
डॉक्टर एन्टोनी: दोस्तों का आगमन कभी-कभी होता है और आप लोगों से कम से कम दस वर्ष बाद मुलाकात हो रही है। अस्पताल कुछ देर से चला जाऊँगा। तीनों मित्र बातचीतों में इतना व्यस्त हो गये कि समय का पता ही न चला। नौकर ने आकर सूचना दी कि बाबा योग क्रिया समाप्त कर चुके हैं। डॉक्टर साहब तुरंत उठकर मित्रों को बाबा से मिलवाने के लिए ले गये और बाबासे जय भगवान एवं फारूख को अपने घनिष्ठ मित्र कहकर मिलवाया। उन्होंने बाबा को अपने मित्रों का नेकदिल, ईमानदार, समाज सेवा के इच्छुक इंसानों के रूप में परिचय दिया और बाबा से उनकी जिज्ञासाएँ शांत करने की प्रार्थना की।
बागड़ी बाबा: मुझे आप लोगों से मिलकर प्रसन्नता हुई और यह जानकर कि आप लोगों की समाज में व्याप्त कष्टों को दूर करने की भावना है, ने मुझे अत्यन्त प्रभावित किया। हमारे देश को, हमारे समाज को निःस्वार्थ स्वयं सेवकों की महती आवश्यकता है। आप लोग आसन ग्रहण करें और अपने प्रश्नों द्वारा अपनी जिज्ञासा शांत करें।
फारूख ने प्रश्न किया: बाबा जैसा मैंने आपके बारे में सुना है आप एक
योग्य एवं मेधावी छात्र रहे हैं, परिवार से भरपूर सम्पन्न रहे हैं। आप एक अच्छे उद्योगपति अथवा प्रशासनिक अधिकारी बनने की क्षमता रखते थे, फिर भी अपना जीवन जनता के लिए कुर्बान कर दिया। सादा जीवन उच्च विचार को अंगीकार किया, आखिर ऐसा फैसला क्यों लिया? आप तो जीवन के सब सुख प्राप्त करने के हकदार थे।
बाबा बागड़ी: दीन दुखियों की सेवा से बड़ा कोई और सुख हो ही नहीं सकता। अतः मैं अपने को सबसे भाग्यशाली एवं सुखी मानता हूँ। जो आनन्द सादा जीवन जीने में है, वह भौतिकवादी सुखों एवं सुविधाओं में नहीं होता। विलासी व्यक्ति मानसिक रूप से अधिक अशांत रहता है। यदि कभी उन सुविधाओं का अभाव झेलना पड़े तो विचलित हो जाता है और उसे कष्टों का अहसास होता है।
फारूख: क्या आप अपने धर्मविहीन इंसानियतका धर्म का हमें परिचय  करायेंगे
बाबा बागड़ी: तुम्हारे इस प्रश्न का उत्तर चन्द घंटों या चन्द दिनों में देना सम्भव नहीं है। डॉक्टर साहब के मित्र होने के नाते मैं तुम्हें सब कुछ विस्तार से बताऊँगा, यदि तुम लोग पर्याप्त समय मुझे दे सको और मेरे आश्रम पर आकर मेरे विचारों को जान सको।
जय भगवान: बाबा हमें खुशी होगी यदि आप हम पर इतनी कृपा करेंगे। हम लोग आपकी सुविधा के अनुसार समय निकाल कर आपके आश्रम पर आ सकते हैं, यह तो हमारा सौभाग्य होगा।
फारूख: जी बाबा, हम लोग आपके आदेश का पालन करेंगे।
जय भगवान: बाबा, हम लोगों की सोमवार की व्यापार से छुट्टी रहती है
अतः उस दिन किसी भी समय आप हमें बुला लें।
बागड़ी बाबा: मेरे लिए सप्ताह के सातों दिन व्यस्त होते हैं परन्तु आप लोगों को आप लोगों की सुविधानुसार सोमवार को सवेरे योग कक्षाओं के पश्चात् अर्थात सात बजे से आप लोगों के लिए समय दे दिया करूँगा। दोनों युवा बाबा की स्वीकृति पाकर अत्यन्त प्रसन्न हुए। डॉक्टर एन्टनी ने इस बीच अपने दोस्तों से विनयपूर्वक विदा ली क्योंकि वे पहले ही काफी लेट हो चुके थे। मरीजों से अधिक प्रतीक्षा करवाना उचित नहीं है। उन्होंने अपने नौकर रामू से अपने दोस्तों और बाबा की मेहमान नवाजी करते रहने को कहा।
बाबा बागड़ी: यहाँ पर आज मैं अपना संक्षिप्त परिचय आप लोगों को देता हूँ, ताकि आज से ही आप मेरे से जुड़ सकें।
मेरे पिता अपने गांव में नामी एवं बड़े जमींदार थे। उनके पास अनेकों खेत एवं बाग थे वे सब उन्हें पैत्रिक सम्पत्ति के रूप में प्राप्त हुए थे। अतः मेरा बचपन सम्पूर्ण सुविधाओं के साथ बीता। मैं अपने विद्यार्थी जीवन में अपनी कक्षा में मेधावी छात्रों में गिना जाता था। ईमानदारी, सत्यता और सादा जीवन मेरे उच्च विचारों की धारणा के पोषक थे। मैं अक्सर गरीबों, दीन-दुखियों, आपदाग्रस्त व्यक्तियों को देखकर विचलित हो जाता था।
हाईस्कूल की शिक्षा के पश्चात् गांधी जी द्वारा लिखित साहित्य को पढ़ने का अवसर मिला। मैं उनके अहिंसा के सिद्धान्त से बहुत प्रभावित हुआ। उनके समाज सेवा, सत्य, राष्ट्रप्रेम, छुआछूत निवारण जैसे भावों से अत्यधिक प्रभावित हुआ। फलस्वरूप मैंने निश्चय कर लिया कि अपनी शिक्षा समाप्त कर देश और समाज की सेवा करूँगा। सत्य, अहिंसा, ईमानदारी, उदारता जैसे गुणों को आत्मसात करूँगा। अतः स्नातकोत्तर की समाजशास्त्र में उपाधि प्राप्त कर अपना सर्वस्व समाज को न्यौछावर कर दिया। मैं अपने पिता की अकेली संतान था। अतः उनके देहान्त के पश्चात् सारी जमा पूंजी को समाज सेवा के लिए लगा दिया। खेत खलिहान बेचकर अनेक शहरों में बागड़ी आश्रम बनवा दिये और उनमें मुफ्त चिकित्सालय खोल दिये। वृद्धों एवं अनाथ बालकों के रहने की व्यवस्था की। प्रत्येक आश्रम में गरीब युवक युवतियों के विवाह आयोजन की व्यवस्था कर दी गयी। गरीब बच्चों की शिक्षा का खर्च भी समय-समय पर आश्रम द्वारा उठाया जाता है। मेरे इस शुभ कार्य से प्रभावित होकर जहाँ-जहाँ आश्रम स्थित हैं वहाँ भी और उसके आसपास शहरों से अनेक सामर्थ्यवानों ने अपना तन-मन-धन से सहयोग देना प्रारम्भ कर दिया। डॉक्टरों ने फ्री मरीजों के देखने के लिए समय दिया, शिक्षकों ने गरीब बच्चों को ट्यूशन देकर उनकी सहायता करने का संकल्प किया, कुछ विद्वान एवं समर्पित लोगों ने आश्रम का संचालन अपने हाथ में लिया। वहीं धनवान व्यक्तियों, उद्योपतियों, अफसरों ने आर्थिक योगदान का प्रस्ताव रखा और आज इतना बड़ा कारवाँ बन चुका है कि तुम जैसे व्यवसायी भी मेरी ओर उन्मुख होकर मेरे सिद्धांतों एवं कार्यशैली जानने के इच्छुक हो गये।
जय भगवान: बाबा क्या आप संन्यासी बन गये हैं, बृह्मचारी हैं? आपने अपना घर भी नहीं बसाया क्या?
बाबा बागड़ी: समाज सेवा के लिए ब्रह्मचारी अथवा सन्यासी बनना आवश्यक नहीं है। महान उद्देश्य का संकल्प लेना ही समाज सेवा के लिए काफी होता है। परिवार बनाना उसका यथा शक्ति पालन करना भी समाज सेवा का ही छोटा रूप है। साधुओं-सन्यासियों को सन्देह के घेरे में लाने की सम्भावना भी बनी रहती है। आज अच्छाईयां को दबाने के लिए अनेक नकारात्मक तत्व उभर कर आते रहते हैं। मैंने समय पर विवाह किया और आज मेरे दो पुत्र बड़े हो चुके हैं। वे अपनी पढ़ाई के अतिरिक्त समय को मेरे कार्यों में सहयोग करते हैं। मेरी पत्नी भी सच्ची समाज सेविका है और मुझे मेरे कार्यों के लिए प्रोत्साहित करती है। वे अक्सर नारी शोषण के खिलाफ आवाज उठाती रहती हैं और नारी उत्थान के प्रयास करती रहती हैं और आज की बैठक यहीं समाप्त होती है। जैसा तुम जानते हो मेरा मुख्य आश्रम यहाँ से पांच किमी पर स्थित है। अगले सोमवार आप लोग वहीं पर मुझसे मुलाकात करेंगे।
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अध्याय एक

   { इस सृष्टि का जन्म कैसे हुआ, कब हुआ, क्यों हुआ आज भी रहस्य के अन्धेरे में है। यदि यह मान लिया जाये कि सृष्टिकर्ता ईश्वर है तो ईश्वर की उत्पत्ति भी अबूझ पहेली है।}

आदि मानव का इतिहास
          फारूख एवं जय भगवान बाबा द्वारा दिये गये समय पर बाबा के आश्रम पहुंच गये, समय था प्रातः 6.45। अभी बाबा अपने शिष्यों को योगाभ्यस करा रहे थे। दोनों दोस्त चुपचाप बाबा का योगाभ्यास के कार्यक्रम से फ्री होने की प्रतीक्षा करने लगे। ठीक सात बजे बाबा ने आकर दर्शन दिये, दोनों दोस्तों ने अभिवादन किया और प्रश्नसूचक मुद्रा में बाबा के संदेश का इंतजार करने लगे।
बागड़ी बाबा: आज हम आप लोगों को प्रथम अध्याय से अपना संदेश कार्यक्रम प्रारम्भ करते हैं और जय भगवान से पूछते हैं, तुम बताओ क्या इंसान जिस रूप में आज हमें-आपको नजर आता है, मानव सृष्टि प्रारम्भ काल में भी ऐसा ही था?
जय भगवान: बाबा जी, जैसा कि मैंने प्रारम्भिक कक्षाओं में पढ़ा है, उसके अनुसार तो इंसान और जानवर में कोई फर्क नहीं था। मानव भी अन्य जानवरों की भांति कन्दमूल फल खाता था और बंदरों की भांति पेड़ों पर रहता था, जंगलों में घूमता था और कन्दराओं में रहना सीख रहा था। इतिहास के पन्नों पर पाषाण युग का वर्णन करते हुए बताया गया है, इस युग में मानव ने पत्थरों से आग जलाना, मांस भूनकर खाना और पेड़ांे की छाल या पत्ते बदन को ढकने के लिए प्रयोग में लाने लगे थे।
बाबा बागड़ी: बिल्कुल ठीक कहा बेटा तुमने और यहीं से हम प्रथम अध्याय का प्रारम्भ कर रहे हैं। इस सृष्टि का जन्म कैसे हुआ, कब हुआ, क्यों हुआ कुछ ऐसे प्रश्न है जिनके उत्तर न तो आज तक मिल पाये हैं और न ही आगे कोई संतोषजनक तर्क संगत उत्तर मिलने की सम्भावना है। जो भी इन प्रश्नों का उत्तर देते हैं वे सिर्फ कल्पना के घोड़े दौड़ाते हैं। ठोस उत्तर किसी के पास नहीं है। परन्तु यह तो निश्चित है इंसान उत्पत्ति काल में कैसा था और पाषाण युग उसकी विकास यात्रा की प्रथम सीढ़ी थी। परन्तु फारूख क्या यह बता सकते हो सिर्फ मानव ही विकास क्रम में प्रवेश कर पाया, अन्य जीव आज भी यथावत स्थिति में है क्यों?
फारूख: बाबाजी, मानव एवं अन्य जीवों में मुख्य अंतर है, मानव का मस्तिष्क, मानव का मस्तिष्क विकास करने की क्षमता रखता है, वह सोच सकता है, विचार करके अपनी परिस्थितियों में परिवर्तन ला सकता है जबकि अन्य जीवों में मस्तिष्क तो होता है, परन्तु अपने दैनिक कार्यों तक सीमित होता है, उनकी विचार शक्ति, परिवर्तन लाने की क्षमता नहीं रखती। उसी अद्भुत विकास क्षमता के कारण मानव ने अपने लिए अपार सुविधाएं जुटा लीं और आज भी निरंतर विकास  की ओर उन्मुख है।
बाबा बागड़ी: तुम दोनों दोस्त वाकई बुद्धिमान हो, और मुझे आशा है तुम्हें समय देकर मेरी मेहनत बेकार नहीं जायेगी, तुम मेरे लिए कारगर शिष्य साबित होगे। हाँ, तो अपने विषय पर लौटते हुए सिर्फ मानव दिमाग ने जो कभी आसमान में चमकती बिजली से भयभीत हुआ, कभी वर्षा की जानकारी लेने का प्रयास किया, अन्य जीवों के बारे में सोचा समझा, गर्मी और जाड़े की पहेली समझने की कोशिश की तो कभी जंगलों में अनेकों पेड़ पौधों के बारे में सोचा समझा।
            अनेक प्रश्नों के उत्तर उसके लिए उलझन पैदा करते रहे। बहुत से प्रश्न तो आज तक भी अनसुलझे हैं। इन अनसुलझे प्रश्नों के उत्तर के रूप में उसने एक अज्ञात-अदृश्य   शक्ति की कल्पना कर डाली। अनसुलझी घटनाओं और परिस्थितियों के लिए उसे जिम्मेदार मानकर अपने मन की जिज्ञासा शांत की।  
      अब इस अदृश्य शक्ति की कल्पना  को भिन्न-भिन्न स्थानों पर, अलग-अलग देशों में पृथक रूपों और पृथक नामों से जाना गया। कहीं पर वह देवता, शिव पार्वती, राम, अल्लाह के नाम से जाना गया तो कहीं पर गौड़ के रूप में उसे देखा गया। सभी ने अपने इष्ट देव को विभिन्न आकृतियों में जाना। सबके पूजा-अर्चना, नमाज, प्रेयर आदि के ढंग भी अलग ही रहे। इष्ट देव की मान्यताओं के ढंग भी अलग ही रहे। इष्ट देव की मान्यताओं के अनुसार धर्म भी अलग-अलग नाम से जाने गये। धर्म के प्रवर्तक और अनुयायियों एवं प्रचारकों ने अपने वर्ग, अपने समाज, देश की कानून व्यवस्था, मानव जीवनचर्या को नियंत्रित करने का भार भी अपने ऊपर ले लिया। समुचित साधनों के विकास के अभाव में यह एक चुनौती भरा कार्य था परन्तु धर्माधिकारी अपने इस शुभ कार्य में सफल हुए। क्योंकि शिक्षा के अभाव में जनता को व्यवस्थित करना, उन्हें समाज में शान्ति-अहिंसा एवं कर्त्तव्यों का पाठ पढ़ाना आसान कार्य नहीं था। उन्होंने धर्म के सहारे मानव को इंसानियत का पाठ पढ़ाया। उनके उद्देश्य महान थे। परन्तु कालान्तर में उनके बताये गये दिशा-निर्देशों का दुरूपयोग शुरू कर दिया गया, कुछ नियमों का अर्थ का अनर्थ बना दिया गया। कुछ कायदे-दिशा-निर्देश विकास के साथ अपरिहार्य हो गये।
        उपरोक्त सभी कारणों से समाज ने अनेकों भ्रांतियों-रूढ़ियों-आडम्बरों को जन्म दिया। अनेकों प्रकार की विसंगतियाँ उत्पन्न हो गयीं। जिन्होंने समाज को कष्टप्रद जीवन जीने को मजबूर कर दिया। अनेक कुप्रथाओं के चंगुल में समाज फंसता चला गया। सती प्रथा, बाल विवाह, दहेज प्रथा, धार्मिक कट्टरता, नारी शोषण, तान्त्रिक  शोषण, छुआछूत जैसी परम्पराओं से समाज कराह उठा।राजा राम मोहन राय, स्वामी विवेकानन्द, दयानन्द सरस्वती, महात्मा गांधी, भीमराव अम्बेडकर जैसे अनेक महापुरुषों ने समाज के दर्द को समझा और यथा शक्ति भरपूर प्रयास कर समाज में सुधार लाये। परन्तु अभी भी बहुत सारी विकृतियाँ समाज में विराजमान हैं, जिन्हें सुधारने की आवश्यकता है। अतः आज के वैज्ञानिक युग एवं विकसित सामाजिक स्थिति में प्रत्येक धर्म में प्रचलित परम्पराओं का तर्कसंगत एवं समाज के हित में विश्लेषण करने की आवश्यकता है। ताकि विसंगतियों, रूढ़ियों, आडम्बरों से समाज मुक्त हो सके और मानव विकास के रथ पर तेज दौड़ लगा सके। इसके साथ ही बाबा बोले आज हम अपने संदेश को यहीं विराम देते हैं। अगली बैठक (मीटिंग) में फिर मिलेंगे। फारूख और जय भगवान दोनों बाबा को प्रणाम कर अपने अपने घर लौट गये। कुछ समय पश्चात जब दोनों अपने शोरूम पर पहुंचे तो दोनों दोस्तों में गजब का उत्साह था, उन्हें बाबा द्वारा किया गया वार्तालाप बहुत पसन्द आ रहा था। वे उनसे अपनी मुलाकात को अपना सौभाग्य मान रहे थे। वे दोनों इतने प्रभावित थे कि उन्हें बाबा के आश्रम में रहकर सेवा करने की इच्छा हो रही थी। परन्तु वे अपने कारोबार एवं पारिवारिक जिम्मेदारियों से बंधे हुए थे। अतः प्रत्येक सोमवार को मुलाकात बनाये रखने का ही विकल्प उनके पास था।
विभिन्न धर्मों का उद्भव
          यद्यपि पाषाण युग  के पश्चात् धर्मों  के उद्भव  तक के सफर को र्काइे  विशेष  इतिहास उपलब्ध नहीं है। सिर्फ कल्पना से ही सोचा  समझा जा सकता है। प्रस्तुत  है बाबा के इस सम्बन्ध में  अपने उद्गार। आज फारूख आरै जय भगवान जब बाबा के आश्रम में  पहुंचे  तो बाबा उन्हीं की प्रतीक्षा  कर रहे थे।उन्होंने दोनों  का भरपूर  स्वागत किया। बाबा भी इन दोनों शिष्यों लेकर  काफी उत्साहित थे। 
 बाबा ने अपना वार्तालाप प्रारंभ करते हुए कहा:

बाबा बागड़ी: धर्मों के उद्भव के बारे में विचार करने से पहले हमें मानव की पाषाणयुग से धर्मों के उद्भव काल तक की विकास यात्रा का अध्ययन करना होगा, जो सिर्फ कल्पना पर ही आधारित है परन्तु तर्क पर आधारित है। सर्वप्रथम पत्थर से आग उत्पन्न कर मांस भून कर खाना, पेड़ों की छाल और पत्तों से बदन ढकना पाषाण युग तक का विकास है। उसके पश्चात् आपसी बातों को एक-दूसरे तक धीरे-धीरे भाषाओं के रूप में विकसित हो गये। विचारों का आदान-प्रदान मानव विकास की महत्वपूर्ण एवं आवश्यक कड़ी थी। भिन्न-भिन्न स्थानों पर भिन्न-भिन्न भाषाओं का विकास हुआ और एक दूसरे के विचार जानने, बतलाने की योग्यता प्राप्त कर ली। उसके पश्चात् प्राकृतिक घटनाओं को सोचने समझने का प्रयास किया गया। कुछ  घटनाएं समझ आयीं तो कुछ को अपनी कल्पना से विश्लेषण किया और कल्पना की किसी अदृश्य शक्ति की अथवा ईश्वर की। भाषाओं के विकास की भांति ईश्वर को भी भिन्न नामों से जाना गया। जब तक मानव ने खेती बाड़ी करना सीख लिया था, अपने समूह में परिवार को इकाई का रूप देना प्रारम्भ कर दिया और भिन्न नदियों अथवा जल स्रोतों के करीब अपने रहने के लिए मकान (झुग्गी-झोंपड़ी) बनाने शुरू कर दिये और समूह को बस्ती का रूप मिल गया।
       मानव ने समूह में मिलकर सभी जीवों को मार डाला अथवा मारने की योग्यता प्राप्त कर ली। कुछ को अपने कब्जे में करना सीख कर अपने लाभ के लिए उनका उपयोग किया। गाय, भैंस, भेड़, बकरी, गधे, घोड़े, ऊँट, हाथी आदि इसी प्रकार के जीवों में आते हैं। जो मानव के लिए नुकसानदायक थे उन्हें नष्ट कर दिया अथवा अपनी बस्ती से खदेड़ दिया। सभी जीवों को नियंत्रित करने के पश्चात समस्या थी, मानवीय व्यवहार को नियंत्रित करने की क्योंकि मानव के पास दिमाग होने के कारण प्रत्येक व्यक्ति का व्यवहार भी भिन्न-भिन्न होता है। सबको साथ मिलकर शांतिपूर्वक रहने के लिए कुछ नियमों का निर्माण कर उन्हें लागू करने की बाध्यता थी।
        ईश्वर के रूप में उसे अभेध अस्त्र प्राप्त हो चुका था और उन्होंने मानव को अपने समाज में रहने के लिए कुछ नियम बनाये और ईश्वर द्वारा बताया गया निर्देश माना गया। जैसे हिंसा न करो, सबके साथ प्यार से रहो, अपने बच्चों और परिवार को पालने की जिम्मेदारी निभाओ, ईश्वर से डरो। उसके कहर से बच नहीं सकते, तुम्हारे सारे कार्य उसकी नजर से बच नहीं सकते। अतः अपने क्रियाकलापों पर नियंत्रण करो, आदि अनेक नियम बनाकर एक धर्म का रूप दे दिया गया। धर्म का वास्तविक अर्थ है- धारण करना अर्थात अपनी जीवन चर्या को एक व्यवस्थित रूप देना।
         ये विभिन्न धर्म ही समाज को जब भी नियंत्रित करते रहें, जब मानव के पास अपराध रोकने के पर्याप्त साधन नहीं थे और आज के हाईटैक युग में भी अपना दखल बनाये हुए हैं। जबकि आज समाज को नियंत्रित करने के लिए अनेकों कानून विद्यमान हो चुके हैं। ईश्वर की वाणी, संदेश के रूप में एकत्र कर प्रत्येक धर्म ने अपने ग्रन्थों की रचना की जिसमें मानव को उसके प्रत्येक कार्य (अवस्थानुसार- आवश्यकतानुसार) के लिए निर्देशित किया गया और मानव जीवन सुलभ कराया। यह भी एक रोचक तथ्य है धार्मिक उद्भव का इतिहास अधिकतम पांच हजार वर्ष पुराना है जबकि पृथ्वी पर सृष्टि का आगमन लाखों वर्ष पूर्व माना जाता है और पृथ्वी का निर्माण काल करोड़ों वर्ष पूर्व माना गया है। स्पष्ट है धर्म का उद्भव उसी समय सम्भव हुआ जब मानव ने भाषा का विकास पूर्ण रूपेण कर लिया, रहने और खाने की व्यवस्था करना सीख लिया अन्य जीवों पर विजय प्राप्त कर ली। उसके पश्चात ही उसे मानव समाज को नियंत्रित करने और अपने विकसित दिमाग को शांत करने का मार्ग खोजना सम्भव हुआ।
 जय भगवान: क्या हमारे पास लगभग पांच हजार पूर्व तक का ही इतिहास उपलब्ध है। उससे पूर्व सिर्फ कल्पनाओं एवं वैज्ञानिक तर्कों पर आधारित इतिहास है?
बाबा बागड़ी: इतिहास एक संचित ज्ञान एवं जानकारी होती है जो बिना लेखन सामग्री एवं लेखन योग्यता (भाषा का विकास, लिपि का विकास) के बिना सम्भव नहीं होता और यह भी सत्य है प्राचीनतम ग्रन्थों में धार्मिक ग्रन्थ ही उपलब्ध हैं। आज भी देसी इलाजों का मुख्य स्रोत आयुर्वेदमाना जाता है जिसमें विभिन्न जड़ी बूटियों के सेवन से मानव स्वास्थ्य रक्षा के उपाय सुझाए गये हैं। यहाँ पर ग्रन्थों का अध्ययन करना अपने मुख्य विषय से हटना होगा। अतः संदर्भ में इतना ही बताना काफी है। हिन्दू धर्म के ग्रन्थ विश्व में प्राचीनतम ग्रन्थ माने जाते हैं जिन्होंने धर्म, ईश्वर और अध्यात्म के विषय में जानकारी उपलब्ध करायी है। साथ ही साथ मानव व्यवहार उसकी जीवनशैली और स्वास्थ्य रक्षा के उपायों का वर्णन भी संचित है। ईसाई धर्म का इतिहास लगभग दो हजार वर्ष पूर्व स्थापित माना जाता है। जबकि इस्लाम धर्म लगभग डेढ़ हजार वर्ष पूर्व स्थापित माना जाता हैबौद्ध धर्म, जैन धर्म भी समकालीन माने जा सकते हैं, सिख धर्म का इतिहास सिर्फ लगभग छः सौ वर्ष पुराना है। विश्व में और अपने देश में अनेक अन्य धर्म भी मौजूद हैं जिनमें अलग-अलग परम्पराएं, मान्यताएं हैं। मानव समाज धर्मों एवं  धर्माधिकारियों द्वारा निर्देशित एवं नियन्त्रित होते रहे। यद्यपि विश्व स्तर पर धर्मों का प्रभाव आपसी सम्बन्धों को पुष्ट करने के लिए बाधित नहीं रहा है। अब मानव ने अपने व्यवहार को धर्मों से जोड़ने की प्रवृत्ति छोड़ दी है। विश्व स्तर पर विकास करने के लिए यह आवश्यक भी हो गया है। सिर्फ मानवीयता या इन्सानियत की धारणा जन्म ले रही है। आज की चर्चा यही पर समाप्त करता हूँ।      क्रमशः जारी है.......... 
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